
धर्मपाल वर्मा
दक्ष दर्पण समाचार सेवा dakshdarpan2024@gmail.com
पंचकूला: हरियाणा में तीन नगर निगमों के चुनाव से एक बार फिर चुनावी सरगर्मी का माहौल बन रहा है। चुनाव कब होंगे अभी तय होना है लेकिन सोनीपत अंबाला और पंचकूला जहां चुनाव होने हैं, वार्ड बंदी और मेयर के ड्रा का काम पूरा हो चुका है। जहां सभी राजनीतिक दल वार्ड दर अपने प्रत्याशी तलाश कर रहे हैं वहीं मेयर उम्मीदवारों को लेकर अभी से चर्चाएं शुरू हो गई है। लोग अपने-अपने तरीके से अनुमान लगा रहे हैं आज हम इस सिलसिले में पंचकूला नगर निगम की एक ऐसी उम्मीदवार का जिक्र करना चाहेंगे जिससे कांग्रेस ही नहीं भाजपा में भी कथित तौर पर ऐसी अनिश्चय की स्थिति बनी हुई है कि उनका एक फैसला सबके लिए निर्णायक साबित हो सकता है।
यह उम्मीदवार सामान्य वर्ग की वह महिला है जिसका नाम पंचकूला नगर निगम के साथ एक खास पहचान के रूप में हमेशा जुड़ा रहेगा । यह है पंचकूला नगर निगम की पहली मेयर श्रीमती उपीन्द्र कौर आहलूवालिया।
श्रीमती अहलूवालिया उस समय मेयर बनी थी जब कांग्रेस का शासन था और मेयर का चुनाव प्रत्यक्ष नहीं अप्रत्यक्ष रूप में पार्षदों से हुआ था और पिंजौर कालका क्षेत्र भी पंचकूला नगर निगम का हिस्सा होते थे।
5 वर्ष पूर्व जब दूसरी बार नगर निगम के चुनाव हुए तो कांग्रेस पार्टी ने उपेंद्र कौर अहलूवालिया को ही उम्मीदवार बनाया लेकिन जानकार मानते हैं कि उनकी हार का कारण भाजपा की मजबूती की बजाय पार्टी के ही कुछ वह लोग थे जो आस्तीन के सांप सिद्ध हुए और योजना बनाकर चुनाव हराने के अपने षड्यंत्र में इसलिए कामयाब हुए कि वह उनका राजनीतिक स्टेटस और बड़ा नहीं होने देना चाहते थे और शायद उनकी छाया से भी डरते थे।
विधानसभा के चुनाव के समय उपेंद्र कौर अहलूवालिया के समर्थकों के पास इन काली भेड़ों को उनकी औकात बताने का अवसर था परंतु उन्होंने कूटनीतिक कारणो से चुनाव नहीं लड़ने का फैसला करके अपने इरादे जाहिर कर दिए कि खुद को साबित करने के मौके फिर भी आएंगे।
आज यह मौका फिर आ गया है अब अहलूवालिया परिवार न्यूट्रल मोड में नजर आ रहा है। देखा जा रहा है कि उनकी कांग्रेस की गतिविधियां न के बराबर हैं। इसके बावजूद वह कांग्रेस के सबसे मजबूत उम्मीदवार के रूप में भी देखे जा रहे हैं। उनके नाम की भाजपा में भी इसलिए खलबली है कि बहुत लोग यह दावा कर रहे हैं कि टिकट की शर्त पर आहलूवालिया परिवार भाजपा में भी जा सकता है। यद्यपि परिवार इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं कर रहा है परंतु कोई यह मानने को भी तैयार नहीं है कि पंचकूला मेयर का चुनाव हो और विधानसभा की तरह यह परिवार घर बैठ जाए। साख और साधन इस परिवार की ताकत है। यहां एक बात और शीशे की तरह साफ है कि यदि अहलूवालिया मैडम भाजपा के प्रत्याशी के रूप में चुनाव में आ गई तो उनके रिकॉर्ड मतों से जीत जाने में कोई संदेह नहीं होगा। दबी जबान से ही सही,भाजपा के मेयर पद के उम्मीदवार भी इस बात को स्वीकार करते हैं।
मान लो अहलूवालिया कांग्रेस की उम्मीदवार नहीं हुई और वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में आ गई तो जानकर यह दावा कर रहे हैं कि कांग्रेस के उम्मीदवार को जमानत बचाने तक के लाले पड़ सकते हैं। यह बात पंचकूला के कोने-कोने में सुनी जा सकती है। यह भी कहा जा रहा है कि जहां तक निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने का सवाल है उनके जीतने की संभावना बेशक 100% ना हो लेकिन वह कांग्रेस के उम्मीदवार का खेल निश्चित तौर पर बिगाड़ देंगी। कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में जिन लोगों के नाम सामने आ रहे हैं उनमें कुछ की हालत तो बहुत खराब है। लेकिन पंचकूला मेयर के चुनाव में स्थानीय विधायक चंद्र मोहन, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा सांसद कुमारी शैलजा और अन्य नेता जब कोई फैसला लेंगे तो उन्हें प्रबल और सक्षम उम्मीदवार के रूप में उपीन्द्र अहलूवालिया के नाम पर जरूर विचार करना पड़ेगा। लेकिन कांग्रेस की फूट और उम्मीदवारों का गलत चयन सबसे ज्यादा किसी के काम आता है तो उस पार्टी का नाम भारतीय जनता पार्टी है। यहां आमतौर पर यह माना जा रहा है कि पंचकूला में मेयर के चुनाव को लेकर भाजपा की स्थिति कमजोर नहीं है। इसीलिए कांग्रेस को भी मेरिट के आधार पर फैसला लेने को मजबूर होना पड़ सकता है। इस मामले मे अभी सब इस बात की इंतजार में है कि उम्मीदवार कौन-कौन होंगे। पंचकूला का चुनाव बहुत रोचक होता दिख रहा है।
