
धर्मपाल वर्मा
दक्ष दर्पण समाचार सेवा dakshdarpan2024@gmail.com
चण्डीगढ़ ।
कांग्रेस के नेता चौधरी बीरेंद्र सिंह की राजनीति में अलग ही पहचान है। उनका ताल्लुक हरियाणा के जिस बांगर क्षेत्र से है उसकी जनता कभी अपने नेताओं को आगे ले जाने के लिए जानी जाती थी ।लेकिन एक दौर डोर ऐसा भी आया कि इस क्षेत्र पर इंडियन नेशनल लोकदल के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला का दबदबा भी देखने को मिला। अब राजनीतिक पर्यवेक्षक यह कयास लगने लगे हैं कि आने वाले समय में एक बार फिर बांगर के लोग अपने नेताओं के लिए खड़े हो जाएंगे और इसका श्रेय उस नेता को मिल सकता है जिसे ट्रेजेडी किंग कहा जाता है।
पहले हम बात करते हैं जींद जिले के लोगों के तासीर की। 1977 में जब कांग्रेस सबसे दयनीय स्थिति में थी तब उसके केवल तीन विधायक जीत पाए थे और इनमें से दो अकेले जींद जिले से जीते। यह थे चौधरी बीरेंद्र सिंह (उचाना )और चौधरी शमशेर सिंह सुरजेवाला (नरवाना) उसे चुनाव में कांग्रेस के तीसरे विधायक जो चुनाव जीत कर आए वह कन्हैया लाल पोसवाल थे जो छछरौली (यमुनानगर) से चुनाव जीतने में सफल हुए थे। इसी संदर्भ में हम रणदीप सिंह सुरजेवाला का जिक्र भी कर सकते हैं। 1993 के अपने पहले चुनाव में बेशक वह चौधरी ओमप्रकाश चौटाला से चुनाव हार गए लेकिन उन्होंने ठेठ बांगर की इन्हीं लोगों के आशीर्वाद से 1996 में चौधरी ओमप्रकाश चौटाला को चुनाव में हराकर भी दिखाया। मुख्यमंत्री के रूप में 2000 में ओमप्रकाश चौटाला नरवाना से चुनाव जीत गए परंतु 2005 में रणदीप सुरजेवाला नरवाना से फिर चुनाव जीते और हरियाणा सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। आप जानते हैं कि हरियाणा के गठन के समय शुरुआत में सदन में 54 सीटें थीं, जिनमें से 10 अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित थीं। मार्च 1967 में इन सीटों की संख्या बढ़ाकर 81 कर दी गई, और 1977 में यह संख्या 90 (जिसमें 17 आरक्षित सीटें शामिल थीं) हो गई। अब तक की सबसे बड़ी जीत 1977 में हुई, जब 1975-77 के आपातकाल के बाद जनता पार्टी ने 90 में से 75 सीटें जीती थीं।
अब हम एक बार फिर चौधरी बीरेंद्र सिंह की बात करते हैं। उन्होंने अपने पुत्र पूर्व सांसद बृजेंद्र सिंह सहित पिछले लोकसभा के चुनाव से पहले एक बार फिर कांग्रेस में शामिल हो घर वापसी की और चुनाव में बृजेंद्र सिंह ने हिसार से टिकट के लिए आवेदन किया परंतु उन्हें टिकट नहीं मिली ।विधानसभा के चुनाव में उन्हें उचाना से चुनाव लड़ने का मौका मिला परंतु यहां भी यह परिवार राजनीतिक साजिश का शिकार हुआ और मात्र 32 वोटो के अंतर से बृजेंद्र सिंह विधानसभा का चुनाव हार गए ।अब इस मामले में पंजाब एवं हरियाणा में एक रिट पैटीशन विचाराधीन है।
पिछले दिनों बृजेंद्र सिंह ने पूरे हरियाणा के सभी विधानसभा क्षेत्रों को नापने की योजना के तहत एक यात्रा शुरू की जिसे सद्भाव यात्रा नाम दिया गया है। समझा जाता है कि यह योजना चौधरी बीरेंद्र सिंह के राजनीतिक अनुभव का एक आईडिया है।
यह एक अनोखी यात्रा इसलिए है कि यह चुनाव को मध्य नजर रखते हुए शुरू नहीं की गई है बल्कि इसका मकसद कांग्रेस को मजबूत करना और जनाधार तलाश करना भी है ।
पर्यवेक्षक इस बात का दावा कर रहे हैं कि बृजेंद्र सिंह की यह यात्रा उनके लिए राजनीतिक तौर पर बहुत निर्णायक साबित होगी क्योंकि इतिहास गवाह है कि राजनीतिक यात्राएं हमेशा लाभदायक साबित होती हैं इतिहास इस बात की भी गवाही देता है कि जो स्वर्गीय चौधरी देवीलाल 1984 के लोकसभा चुनाव में सोनीपत लोक सभा क्षेत्र से चुनाव हारने के बाद घर बैठ गए थे। वह 2 साल बाद फिर सक्रिय हुए तो उन्होंने न्याय युद्ध के नाम पर पूरे हरियाणा में जो यात्रा की उसी की लोकप्रियता की नाव में सवार होकर वह सत्ता तक पहुंच पाए और वे 90 में से अपने 85 विधायक जिता कर लाने में कामयाब हुए। मुख्यमंत्री बनने से पहले कांग्रेस के नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी एक पदयात्रा की थी।
बृजेंद्र सिंह की उम्र ,उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि, सोच और कॉन्फिडेंस उनके काम आ सकते
है और जींद जिले के बांगर के लोग एक बार फिर उनमें अपना राजनीतिक भविष्य तलाशते नजर आ सकते हैं। ऐसी स्थिति भी बन सकती है कि आने वाले समय में विशेषकर जींद जिले में बृजेंद्र सिंह का सिक्का इस तरह से जमे कि जनाधार और लोकप्रियता के मामले में उनकी ही तूती बोलने लगे। ऐसा लगता है कि किसी दिन कांग्रेस के नेता राहुल गांधी सद्भाव यात्रा मैं शिरकत करने आ सकते हैं ऐसे में इस यात्रा से दूरी बना कर चल रहे कांग्रेस के नेताओं को भी इसमें शामिल होना पड़ सकता है। बृजेंद्र सिंह ने यह यात्रा राहुल गांधी से बात करके शुरू की थी।
चौधरी बीरेंद्र सिंह हरियाणा के अकेले ऐसे नेता हैं जिनका राजनीति में रहते हुए अपना इकलौता बेटा आईएएस बना और फिर संसद में भी पहुंचा। ऐसा लगता है चौधरी बीरेंद्र सिंह की अगली पीढ़ी को भी यह सुख भोगने का अवसर मिल सकता है। चौधरी वीरेंद्र सिंह की पोती कुदरत बहुत ही होनहार लड़की है जो अपने पिता बृजेंद्र सिंह की तरह आईएएस अफसर बनना ना चाहती है, तैयारी कर रही है। उसकी योग्यता पर किसी को भी संदेह नहीं है। क्योंकि बताते हैं कि खुद चौधरी बृजेंद्र सिंह यह कहते हैं कि जब वे कुदरत के सामने बैठते हैं और बात करते हैं तो उसकी इंटेलिजेंस को देखते हुए वह खुद को अनपढ़ सा महसूस करने लग जाते हैं। कुदरत के आईएएस बनने की संभावनाएं तो प्रबल है ही हालात यह बता रहे हैं कि समय आने पर यह लड़की भी राजनीति में आ सकती है क्योंकि उसकी राजनीतिक सोच पर भी लोग दातों तले उंगली दबाने को मजबूर हो रहे हैं। परिवार तो अभी से उसकी राजनीतिक सोच का कायल है। लोग यात्रा में कई बार कुदरत को चौधरी बृजेंद्र सिंह के साथ कदमताल करते देखते होंगे। वह समय मिलते ही यात्रा में भी शामिल हो जाती है। पाठकों को बता दें कि कुदरत ने यूके में विश्व प्रसिद्ध कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में एमफिल में टॉप करके हरियाणा भारतवर्ष और अपने परिवार का नाम रोशन किया था।
