
लेखक: राजबीर सिंह भारतीय
(वरिष्ठ उपाध्यक्ष, मनीमाजरा EWS रेजिडेंस वेलफेयर एसोसिएशन, चंडीगढ़ एवं सेवानिवृत्त सुपरिंटेंडेंट, महाधिवक्ता कार्यालय, हरियाणा)
सृष्टि के कण-कण में यदि ईश्वर का कोई साक्षात स्वरूप विद्यमान है, तो वह ‘माँ’ है। मदर्स डे मात्र एक तिथि नहीं, बल्कि उस अनंत ममता और निस्वार्थ त्याग के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है, जो एक राष्ट्र के चरित्र का निर्माण करती है। मेरा मानना है कि माँ केवल एक परिवार की धुरी नहीं, बल्कि वह समाज की पहली शिक्षक और संस्कारों की असली शिल्पकार है।
इतिहास की गौरवगाथा और मातृ-शक्ति
जब हम मातृ-शक्ति की बात करते हैं, तो भारत का इतिहास ऐसी वीरांगनाओं से भरा मिलता है जिन्होंने सिद्ध किया कि माँ का कोमल हृदय राष्ट्र की रक्षा के लिए वज्र जैसा कठोर भी हो सकता है।
शौर्य की प्रतीक दुर्गा भाभी: आजादी की लड़ाई में दुर्गा भाभी (दुर्गावती देवी) का योगदान अविस्मरणीय है। सांडर्स वध के बाद जब अंग्रेजी हुकूमत भगत सिंह की तलाश में थी, तब दुर्गा भाभी ने अपनी जान की परवाह न करते हुए, एक ‘माँ’ और ‘पत्नी’ का रूप धरकर उन्हें सुरक्षित निकाला। उन्होंने न केवल बम बनाए, बल्कि क्रांतिकारियों के दल को एक माँ की तरह संरक्षण भी दिया।
क्रांतिकारी चेतना: महात्मा ज्योतिबा फुले और माता सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा की जो ज्योति जलाई, उसने समाज की हर बेटी को ‘वैचारिक माँ’ बनकर जीने की शक्ति दी।
करुणा का वैश्विक स्वरूप: मदर टेरेसा ने यह सिखाया कि ममता की कोई सरहद नहीं होती। उन्होंने हर असहाय को अपनी संतान मानकर सेवा की। वहीं कस्तूरबा गांधी ने बापू के साथ कदम से कदम मिलाकर पूरे देश के लिए ‘बा’ (माँ) की भूमिका निभाई।
न्याय, प्रशासन और ‘आधी आबादी’ का हक
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के महाधिवक्ता कार्यालय में अपने लंबे प्रशासनिक कार्यकाल के दौरान मैंने अनुभव किया कि जब एक महिला सशक्त होती है, तो वह पूरे तंत्र को संवेदनशीलता और पारदर्शिता से भर देती है।
आज की भारतीय नारी श्रीमती इंदिरा गांधी जैसी मजबूत इच्छाशक्ति रखती है, किरण बेदी जैसा अनुशासन दिखाती है और कल्पना चावला की तरह आसमान नापने का साहस रखती है। लेकिन आज मदर्स डे पर हमें यह आत्मचिंतन करना होगा कि क्या हम अपनी माताओं और बहनों को उनका वास्तविक हक दे पा रहे हैं?
मेरा स्पष्ट मानना है कि महिलाओं को अब केवल 33% आरक्षण तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। राजनीति, प्रशासन और हर निर्णयकारी मंच पर महिलाओं की 50% भागीदारी होनी चाहिए। “आधी आबादी” को जब तक “पूरा हक” नहीं मिलेगा, तब तक विकसित भारत का सपना अधूरा है।
वार्ड नंबर 4 (मनीमाजरा) और चंडीगढ़ और समाज के प्रति संकल्प
मनीमाजरा EWS रेजिडेंस वेलफेयर एसोसिएशन के माध्यम से मेरा यह निरंतर प्रयास रहता है कि हमारे वार्ड नंबर 4 और चंडीगढ़ तथा देश की हर माता और बहन को सम्मानजनक जीवन मिले। हमारा संकल्प है कि क्षेत्र की हर बेटी शिक्षित हो और हर माँ आत्मनिर्भर बने।
निष्कर्ष
माँ के चरणों में ही स्वर्ग है, और माँ का आशीर्वाद ही हमारी असली पूंजी है। आइए, इस मदर्स डे पर हम संकल्प लें कि हम न केवल अपनी माँ का सम्मान करेंगे, बल्कि समाज में नारी शक्ति के प्रति सुरक्षा, समानता और गरिमा का वातावरण भी तैयार करेंगे।
”नारी तुम केवल श्रद्धा नहीं, तुम शक्ति का अवतार हो।
इस सृजनशील समाज की, तुम ही असली आधार हो।”
मातृ शक्ति को कोटि-कोटि नमन!

राजबीर सिंह भारतीय
