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धर्मपाल वर्मा
दक्ष दर्पण समाचार सेवा
चण्डीगढ़।हरियाणा में राज्यसभा के चुनाव को लेकर लोगों में उत्साह कम जिज्ञासा ज्यादा है परंतु पूरा हरियाणा यह देख रहा है कि इस चुनाव में हार जीत का फैसला तो जो होगा सो होगा परंतु इसमें रोहतक के दो नेताओं के भाग्य का फैसला जरूर होगा । एक रोहतकी भूपेंद्र सिंह हुड्डा है तो दूसरा सतीश नांदल। सब लोग यह मानकर भी चल ही रहे हैं कि जब परिणाम आएंगे तो इन में से एक जरूर न केवल हारेगा बल्कि राजनीति के हाशिए पर भी चला जाएगा। रोहतक क्षेत्र का तासीर क्या है, लोग जनते हैं क्योंकि एक कहावत प्रचलित है कहा जाता है कि एक रोहतकी सौ कौतुकी ।

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वैसे इस चुनाव में कोई चमत्कार होता दिख नहीं रहा है परंतु कहने वाले अब भी दो बात कह ही रहे हैं । एक यह है कि सतीश नांदल यूं ही मैदान में नहीं आ गया है या यूं कहिए कि भाजपा ने तीसरा उम्मीदवार अपना मजाक उड़वाने के लिए खड़ा नहीं किया है। यह भी कि यह तीसरा उम्मीदवार खुद को कमजोर मानकर नहीं चल रहा है क्योंकि ऐसा होता तो 9 मार्च को नामांकन पत्र वापस ले कर अपने घर चला गया होता।परंतु ऐसा हुआ नहीं। अब मतदान का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
पर्यवेक्षक बार-बार यह कह रहे हैं कि हालात इस तरह के नजर आ रहे हैं कि निर्दलीय उम्मीदवार को भाजपा और निर्दलीय विधायकों को छोड़ कर किसी और का समर्थन मिलने वाला नहीं है। मतलब यह कि भाजपा के 48 विधायक हैं । तीन निर्दलीय भी उसके साथ हैं ।यह संख्या बल 51 है । अपने एक उम्मीदवार की जीत के लिए भाजपा को 31 विधायकों की जरूरत पड़ेगी और उसके बाकी 20 विधायक ही ऐसे होंगे जिनके मत भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के पक्ष में जा सकते हैं। इनके 21 होने के आसार भी कम बताए जा रहे हैं ।जहां तक इनेलो के दो विधायकों का सवाल है राजनीति यह कहती है कि उनके पास मतदान के दौरान गैर हाजिर होने के अलावा कोई और सम्मानजनक विकल्प मौजूद नहीं है । इनके लिए मतदान के समय विधानसभा में जाना भी आग से खेलने जैसा होगा। फिर तो यह कहा जाएगा कि आ बैल मुझे मार।
अब तो इनेलो ही नहीं कांग्रेस और उसमें भी भूपेंद्र सिंह हुड्डा भाजपा का विरोध करके राजनीति करते नजर आ रहे हैं। इनमें से कोई भी भाजपा की बी टीम कहलवाने से बचना चाहता है। ऐसे में यह संभव ही नहीं है कि इनेलो निर्दलीय उम्मीदवार के पक्ष में वोट डालने की जुर्रत भी करेगा। जानकार यह मानकर चल रहे हैं कि निर्दलीय उम्मीदवार को 20 से एक भी ज्यादा वोट पड़ी तो उसके बड़े मतलब निकल आएंगे और यदि कांग्रेस उम्मीदवार को मिलने वाले मतों की संख्या 37 से एक भी कम हुई तो यह भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं रहेगा। जाहिर है उनकी विश्वसनीयता तथा विधायक दल के नेता के रूप में उपयोगिता पर भी सवाल खड़े हो जाएंगे। इस मामले में भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी बहुत गंभीर हैं और आज ताल ठोंक कर यह कह रहे हैं कि कांग्रेस चट्टान की तरह मजबूत है। उनका आत्म विश्वास बता रहा है कि इस मामले में चिंता वाली कोई बात नहीं है। भूपेंद्र सिंह हुड्डा यह कहते दिख रहे हैं कि ,”हम भी दरिया हैं ,हमें अपना हुनर मालूम है ।जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता बन जाएगा। भूपेंद्र सिंह हुड्डा को मैनेजमेंट का खिलाड़ी माना जाता है। ऐसा भी लगता है कि श्री हुड्डा ने कांग्रेस के सभी विधायकों को बशीर बद्र के इस शेर का अर्थ र बता दिया है जिसमें कहा गया है कि
“कोई हाथ भी ना मिलाएगा जो यूं मिलोगे तपाक से, यह अलग मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो।
भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी इस बात को अपने तरीके से कह ही रहे हैं कि इंडियन नेशनल लोकदल को इस चुनाव में अब्सेंट रहना चाहिए।
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यह बात शीशे की तरह साफ है कि कांग्रेस को तो इसलिए भी इंडियन नेशनल लोकदल के समर्थन की जरूरत नहीं है कि उसके पास पर्याप्त बहुमत है। लेकिन इंडियन नेशनल लोकदल भाजपा के या भाजपा समर्थित उम्मीदवार के पक्ष में जाकर राजनीतिक आत्महत्या नहीं करना चाहेगा क्योंकि अब उसने सरकार के खिलाफ जो मुहिम छेड़ रखी है उसका मतलब ही कुछ नहीं रह जाएगा। सब जानते हैं कि चुनाव के बाद से इंडियन नेशनल लोकदल सरकार के खिलाफ आक्रामक तरीके से लड़ाई लड़ता आ रहा है। वृद्धावस्था पेंशन के संदर्भ में तो उसके कार्यक्रमों के कारण सरकार बैक फुट पर आ गई है।भूपेंद्र सिंह हुड्डा को भी पता है की इंडियन नेशनल लोकदल निर्दलीय प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करेगा परंतु भूपेंद्र सिंह हुड्डा शायद अभय सिंह चौटाला को यह संदेश भी देना चाहते हैं कि लोग देख रहे हैं और दोनों की भूमिका पर उनकी पैनी नजर भी है। और ऊंट की छोरी कभी कोडे कोडे नहीं होती। खास बात यह है कि हरियाणा के लोग इस चुनाव में हर उठा पटक और नेताओं की गतिविधियों पर नजर रखे हुए हैं। राज्यसभा का यह आम चुनाव नहीं है यह चुनाव राज्य में राजनीति को नई दिशा और दशा तय करने का काम कर सकता है ।यदि किसी ने भी गलती की उसे लोग सजा देने से चूकेंगे नहीं। यहां के लोग चुनाव के जरिए ऐसा संदेश देने के लिए विख्यात हैं जो गहरे अर्थ रखता है। चुनाव में खरीद फरोख्त की बात सामने आई, हेरा फेरी की गई मतलब कुछ भी गलत हुआ जो तो लोग उसे चुपचाप नहीं देखते रहेंगे बल्कि इसके दूरगामी परिणाम सामने आएंगे। चोरी चोरी चुपके चुपके ही सही कोई हेरा फेरी की जाती है तो हरियाणा के लोग क्रिया पर प्रतिक्रिया करते हैं।
इतिहास बताता है कि 1982 में जब चौधरी देवीलाल मुख्यमंत्री बनते बनते रह गए ,उनके साथ योजनाबद्ध तरीके से हेरा फेरी की गई तो अगले चुनाव में हेरा फेरी की सारी संभावनाएं समाप्त करने के लिए लोगों ने उन्हें 85 विधायक जिता कर दे दिए थे । इसे आप 1982 के षड्यंत्र का रिएक्शन कह सकते हैं। कहने का मतलब यह है कि चुनाव में मत महत्वपूर्ण होते हैं प्रभाव या रुतबा नहीं। इसीलिए किसी शायर ने सही कहा है कि,जम्हूरियत दर्ज ए हुकूमत है जिसमें सिर गिने जाते हैं तोले नहीं जाते। इसके पक्ष में जरूरी विधायक होंगे वही जीतेगा लेकिन यह चुनाव और इसके परिणाम सतारूढ़ भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और इंडियन नेशनल लोकदल के लिए बहुत निर्णायक साबित हो सकता है । हकीकत यह है कि इस समय लोग चुप बैठे हैं उन्हें भी अपना भविष्य तय करना है।
