
धर्मपाल वर्मा
दक्ष दर्पण समाचार सेवा ।
नई दिल्ली ।
किसी ने सही कहा है कि हरियाणा में देश में सबसे कम छुआछूत है लेकिन यहां राजनीति जाति पाती पर आधारित रही है। आज नहीं संयुक्त पंजाब में भी ऐसा ही देखने को मिलता था।
आप धर्म बदल सकते हैं प्रदेश और देश बदल सकते हैं, लिंग भी बदल सकते हैं परंतु जाति नहीं बदली जा सकती। किसी भी सूरत में नहीं बदली जा सकती। हरियाणा में कभी अगले पिछड़े की राजनीति होती रही है, कभी जाट गैर जाट की कई बार क्षेत्रवाद की तो कभी शहरी और ग्रामीण की भी। हरियाणा में बेशक ब्राह्मणों की आबादी बहुत ज्यादा नहीं है लेकिन ब्राह्मण राजनीति में निर्णायक स्थिति में इसलिए रहे हैं कि उन्हें इस मामले में परफेक्ट और एक्सपर्ट माना जाता है ।इसका कारण समाज में प्राप्त मान सम्मान तो है ही, शिक्षा भी एक आधार और कारण रहा है। हरियाणा में एक व्यवहारिक सत्य यह है कि कई बार कुछ सामाजिक और राजनीतिक कारणों से दबे कुचले ,दलित और कमजोर वर्ग के लोग ब्राह्मण समुदाय की आड़ लेकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करते देखे गए हैं। ऐसे में राजनीतिक तौर पर भी ब्राह्मणों का हरियाणा में आरंभ से हस्तक्षेप रहा है ।
प्रदेश में सबसे पहले ब्राह्मण मुख्यमंत्री के रूप में स्वर्गीय भगवत दयाल शर्मा को मौका नहीं मिला बल्कि वह लगातार दो बार मुख्यमंत्री भी बने। पंडित भगवत दयाल शर्मा हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी रहे। वह संयुक्त पंजाब कांग्रेस कमेटी के भी अध्यक्ष रहे।
आज भारतीय जनता पार्टी के हरियाणा के राज्यसभा के दो सांसद ब्राह्मण हैं ।पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मोहनलाल बडोली ब्राह्मण है । दो मंत्री ब्राह्मण हैं विधानसभा के चुनाव में भाजपा ने एक दर्जन ब्राह्मणों को विधानसभा में टिकट देकर यह साबित करने की कोशिश की कि पार्टी ब्राह्मणों की अहमियत को समझती है।
कभी ब्राह्मण कांग्रेस के मजबूत वोट बैंक के रूप में देखे जाते थे परंतु धीरे-धीरे वह भारतीय जनता पार्टी की तरफ शिफ्ट हो गये और अब जब कांग्रेस विशेष कर हरियाणा में अपने वोट बैंक पर विचार करती है तो उसे लगता है कि ब्राह्मण का खिसक जाना कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी साबित हुआ है।
पिछले चुनाव में भी कांग्रेस ने एक बड़ी ग़लती की। उसने 90 विधानसभा क्षेत्रों में केवल पांच ब्राह्मणों को ही टिकटें दी।
अब हरियाणा में राज्यसभा के आगामी चुनाव में यह संभावना बहुत प्रबल हो रही है कि पार्टी के नेता पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा राज्यसभा में उम्मीदवार के रूप में किसी ब्राह्मण का नाम आगे करके चलें और पार्टी के नेताओं को मतलब हाई कमान को यह समझाने का पर्यटन करें कि इसके अलावा पार्टी के पास और कोई ठोस विकल्प नहीं है।
हम पहले ही बता चुके हैं कि भूपेंद्र सिंह हुड्डा की तरफ से यह तर्क जरूर दिया जाएगा कि राज्यसभा में किसी रविदासी को टिकट देने का औचित्य इसलिए नहीं है कि पार्टी के हरियाणा के रिजर्व सीटों पर जीतकर आए दोनों सांसद रविदासी समाज से हैं। राजनीतिक हालात ऐसे हैं कि किसी जाट को उम्मीदवार बनाना भी कई कारणो से संभव नहीं माना जा रहा। जहां तक पंजाबी समुदाय का सवाल है अब लगभग यह मान लिया गया है कि केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल के हरियाणा के मुख्यमंत्री बनने के बाद पंजाबी समुदाय के लोगों का रुझान भाजपा से जुदा नहीं हो पाएगा ।ऐसे में किसी पंजाबी के नाम पर रिस्क लेने की संभावना कम नजर आ रही है। अग्रवाल समाज की बात करें तो उसे प्रतिनिधित्व देने की संभावनाएं भी कम ही नजर आ रही है ।ऐसे में राजनीतिक उपयोगिता तो प्राथमिकता है ही, भूपेंद्र सिंह हुड्डा कुलदीप शर्मा के निष्ठा परिवर्तन के बाद ब्राह्मणों में अपना वर्चस्व बढ़ाने की कोशिश में जरूर होंगे ।ऐसे में उनके पास दो ऐसे मजबूत उम्मीदवार हैं जिनका नाम आगे किया जा सकता है ।एक है जितेंद्र भारद्वाज दूसरे हैं चक्रवर्ती शर्मा। जितेंद्र भारद्वाज पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष रहे हैं परंतु जनाधार के मामले में सक्षम नहीं बताए जाते ऐसे में उन्हें राज्यसभा भेज कर भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी एक तीर से दो शिकार कर सकते हैं ।
जितेंद्र भारद्वाज सांसद और कांग्रेस की नेत्री प्रियंका गांधी के भी विश्वास पात्र बताएं जाते हैं। उनके नाम पर हाई कमान सहानुभूति पूर्वक विचार कर सकती है।
चक्रवर्ती शर्मा राजनीतिक सोच के और भूपेंद्र सिंह हुड्डा के विश्वासपात्र ऐसे नेता हैं जो सरकार में पर्यटन निगम के चेयरमैन रहे हैं पार्टी हाई कमान में उनकी पहचान भी है और हस्तक्षेप भी। उन्हें एक बार विधानसभा का चुनाव लड़ने का मौका मिला था परंतु सफलता नहीं मिल पाई ।उन्हें हरियाणा में कांग्रेस में राज्यसभा उम्मीदवार के रूप में उपयुक्त दावेदार माना जा। कुल मिलाकर राज्यसभा चुनाव में किसी ब्राह्मण को मौका देने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इस मामले में जहां हाई कमान को फैसला करना है वहीं भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी निर्णायक स्थिति में है। देखते हैं मौके पर कांग्रेस किस तरह के राजनीतिक कौशल का परिचय देगी।
