
दक्ष दर्पण समाचार सेवा
फतेहाबाद, 04 जनवरी । कहते हैं, नशा सिर्फ शरीर को ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज को तोड़ देता है। यह कहानी है गांव तामसपुरा निवासी कुलदीप की—एक ऐसे व्यक्ति की, जिसने नशे की गलती की कीमत लगभग अपनी जिंदगी से चुकानी पड़ी, लेकिन सही समय पर मिली मदद ने उसे फिर से जीना सिखा दिया।

कुलदीप एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखता है। दोस्तों की गलत संगत में पड़कर उसने मौज-मस्ती के लिए मेडिकल नशा करना शुरू किया। शुरुआत में उसे लगा कि यही सुकून है, यही खुशी, लेकिन यह खुशी कुछ समय की ही मेहमान साबित हुई।
धीरे-धीरे नशे की मात्रा बढ़ती गई—पहले दो गोलियां, फिर पांच और फिर रोज़ाना 15–20 गोलियां। जब गोलियों से नशे की पूर्ति नहीं हुई, तो उसने इंजेक्शन का रास्ता चुन लिया। यहीं से उसकी जिंदगी ने सबसे खतरनाक मोड़ ले लिया।
लगातार इंजेक्शन लगाने के कारण उसके एक हाथ में गैंग्रीन हो गया। उंगलियां सूखने लगीं और घाव बढ़ते चले गए। काम छूट गया, लोग उससे दूर होने लगे। परिवार भी मजबूरी में उससे दूरी बनाने लगा और गांव-पड़ोस में उसे नफरत की नजर से देखा जाने लगा।
*एक समय ऐसा आया जब कुलदीप पूरी तरह अकेला पड़ गया—न कोई सहारा था, न कोई उम्मीद।*
*लेकिन कहते हैं, जब सभी रास्ते बंद हो जाते हैं, तभी एक नया रास्ता खुलता है।*
गांव तामसपुरा में *ऑपरेशन जीवन ज्योति अभियान* के तहत फतेहाबाद पुलिस की नशा मुक्ति टीम का कैंप लगाया गया। *पुलिस अधीक्षक श्री सिद्धांत जैन, आईपीएस* के मार्गदर्शन में चल रहे इस अभियान के तहत नशा पीड़ितों तक पहुंचने का निरंतर प्रयास किया जा रहा था। जब नशा मुक्ति टीम इंचार्ज सुंदर लाल को कुलदीप के बारे में जानकारी मिली, तो वे बिना देर किए उसके घर पहुंचे।
*वह दृश्य बेहद पीड़ादायक था—कुलदीप एक कोने में चारपाई पर पड़ा था, बिल्कुल अकेला। लेकिन सुंदर लाल ने वहां हार नहीं, बल्कि उम्मीद देखी।*
उन्होंने पहले परिवार और पत्नी बीना का मनोबल बढ़ाया और कहा,*“आप हमें इसे सौंप दीजिए, हम इसे जरूर ठीक करेंगे।”*
बीना की आंखों में आंसू थे, लेकिन दिल में उम्मीद जाग उठी। उसने भावुक होकर कहा, *“आप हमारे लिए देवता बनकर आए हैं, मेरे पति को बचा लीजिए।”*
इसके बाद नशा मुक्ति टीम ने कुलदीप की नियमित देखभाल शुरू की। दवाइयों के साथ-साथ उसे हर दिन यह एहसास दिलाया गया कि वह बेकार नहीं है और उसकी जिंदगी अभी खत्म नहीं हुई है। निरंतर उपचार, परामर्श और हौसले के बल पर कुलदीप ने धीरे-धीरे नशे को छोड़ दिया और जीवन को फिर से अपनाया।
आज वही कुलदीप पूरी तरह नशा-मुक्त है और अपने परिवार के साथ सम्मानपूर्वक जीवन जी रहा है। उसकी 10 वर्षीय बेटी किरणदीप कौर अब गर्व से अपने पिता के पास बैठती है और उनसे प्यार से बातें करती है। गांव वाले, जो कभी उसे नफरत की नजर से देखते थे, आज उसे सम्मान की नजर से देखते हैं। गैंग्रीन के कारण उसके एक अंगूठे और दो उंगलियों को नुकसान अवश्य हुआ, लेकिन उसकी कीमती जिंदगी को बचा लिया गया।
*कुलदीप की पत्नी बीना कहती हैं,*
“फतेहाबाद पुलिस हमारे लिए भगवान का रूप है। इन्होंने मेरे पति को नशे की दलदल से निकालकर हमें दोबारा सम्मान के साथ जीना सिखाया।”
*फतेहाबाद पुलिस की प्रेरणादायक सोच*
यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि नशा कितना भी गहरा क्यों न हो, उससे बाहर निकला जा सकता है। सही समय पर मिली मदद जिंदगी बचा सकती है और जब समाज व प्रशासन एकजुट होकर साथ खड़े होते हैं, तो चमत्कार संभव हो जाता है।
