
दक्ष दर्पण चण्डीगढ़।
बेटी हुई है ! सुनते ही माता प्रकाश कौर और पिता बलदेव सिंह बड़े प्रसन्न हुए क्योंकि यह उनकी दूसरी संतान थी, पहली संतान के रूप में उनके घर पुत्र ने जन्म लिया था । दोनों बहुत खुश थे कि अब उनका परिवार पूरा हो गया है । बहुत ही सुंदर बच्ची थी और मां बाप ने इसका नाम रखा सुखमन !
दो दिन तक तो ठीक-ठाक चल रहा था और इस बीच तीसरे दिन इस बच्ची को स्वास्थ्य प्रति दिक्कतें होने लगी । माता-पिता बच्ची को अस्पताल ले गए और वहां जाकर इसके सारे टेस्ट हुए तो पता चला कि बच्ची को नर्वस सिस्टम संबधित बहुत सारी जटिल बीमारियों ने घेर रखा था ।
इसके बाद सुखमन का स्थानीय अस्पताल में इलाज़ चलने लगा परन्तु एक हफ़्ते के बाद डॉक्टरों ने इलाज़ करने से मना कर दिया और राज्य के बहुत बड़े सरकारी अस्पताल को रेफ़र कर दिया । इस अस्पताल में डॉक्टरों की टीम ने लगभग एक महीना सुखमन का इलाज करने के लिए अपनी तरफ से हर संभव प्रयास किया ताकि इसको रोग मुक्त किया जा सके ।
अंत डॉक्टरों ने बड़ी मुश्किल से अपने दिल पे हाथ रख कर परिजनों को बताया कि सुखमन को बचाना अब नामुमकिन है । साथ ही टीम ने यह परामर्श भी दिया कि इस बच्ची के अंग किसी और रोगी में प्रत्यरोपित करके उस इंसान की जान बचाई जा सकती है ।
चालीस दिन की इस बच्ची के संबन्धित इस तरह का निर्णेय लेना माता-पिता के लिए बहुत कठिन था मगर इस महान माता-पिता ने इंसानियत का परिचय देते हुए इस नेक काम के लिए हामी भर दी ।
डॉक्टरों ने सुखमन की किडनी एक नाबालिग बच्चे में प्रायतारोपित करके उसकी जान बचा दी । बेशक आज़ सुखमन प्रत्यक्ष रूप में इस संसार में नहीं है पर उसकी वजह से एक मासूम बच्चा अनमोल ज़िदगी जी रहा है । सचमुच अंगदान से बढ़कर कोई और दान हो नहीं सकता क्यूंकि अंगदान जीवन देता है और हमारे मरने के बाद भी हमे दुनिया में जीवित रखता है ।
–राकेश बैंस
