
धर्मपाल वर्मा।
दक्ष दर्पण समाचार सेवा
चण्डीगढ़।
(पोलिटिकल डैस्क)
कांग्रेस का एक फैसला भविष्य में उसकी जीत का मार्ग प्रशस्त कर सकता था। इसके लिए पार्टी को विजय इंद्र सिंगला को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहिए था। बताते हैं कि पार्टी ने यह फैसला ले भी लिया था लेकिन अंतिम क्षणों में बड़ा फेरबदल हो गया।
जानकार यह मानकर चल रहे हैं कि सिंगला कांग्रेस के लिए मल्टीपरपज नेता साबित हो सकते थे।
पंजाब में भारतीय जनता पार्टी सरकार बनाने का दावा कर रही है लेकिन हाल फिलहाल पंजाब का मुकाबला आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच नजर आ रहा है । ऐसे में समय रहते कांग्रेस पंजाब में हिंदू सिक्ख कांबिनेशन के फार्मूले को अप्लाई करने में सफल हो गई होती तो इसे उसकी प्रभावी कूटनीति के रूप में देखा जा सकता था।
आप जानते हैं कि पंजाब में प्रभारी बदलकर राहुल गांधी ने यह साबित कर दिया था कि वह भी राजनीति के कुशल खिलाड़ी हैं। यह अलग बात है कि निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष राजा वडिंग का त्यागपत्र चोरी चोरी चुपके चुपके ही सही परंतु एक व्यवहारिक योजना के तहत हुआ है। कांग्रेस इस बात से बचती नजर आ रही है कि उसके नेताओं ने प्रदेश अध्यक्ष का त्यागपत्र मांग लिया था। देखा जाए तो यह त्यागपत्र मांगा हुआ नहीं एक योजना के तहत दिया हुआ त्यागपत्र है । जिसमें प्रभारी की अहम भूमिका है।
नए प्रभारी ने जो सोचा समझा और जाना । उन्होंने भी यह जान और मान लिया कि पंजाब कांग्रेस से कई वरिष्ठ नेता प्रदेश अध्यक्ष को बदलने की मांग कर रहे थे। शायद उनका विचार यह बन गया कि यह मांग पूरी किए बिना पंजाब कांग्रेस के संगठन की गाड़ी आगे नहीं चल पाएगी ।अब कांग्रेस की कई चीज बदल सकती हैं लेकिन इसके लिए यदि पार्टी हिंदू नेता के रूप में पूर्व मंत्री विजय इंद्र सिंगला को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का फैसला ले लेती तो उसे हिंदू वोटर्स का समर्थन और पंजाब के मालवा क्षेत्र का निर्णायक सहयोग भी प्राप्त हो सकता था।
राहुल गांधी और कांग्रेस के नेता इस बात को मन मस्तिष्क में रखकर चल रहे हैं कि जट्ट सिक्ख को आगे किए बिना पंजाब में सरकार बनाना आसान नहीं होगा। इसीलिए जट्ट-सिक्ख प्रधान को हटाकर जट्ट-सिक्ख को ही नया प्रधान बनाया गया है।
विजय इंद्र सिंगला न केवल राहुल गांधी की पसंद है बल्कि पार्टी में लगातार मजबूत होते जा रहे एक महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला की गुड बुक्स में भी है। कांग्रेस विजय इंद्र सिंगला को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भाजपा के हिंदू वोट पर भी चोट कर सकती थी। इसीलिए श्री सिंगला को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के आसार नजर आ रहे थे।
एक बात साफ है की कांग्रेस पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के दबाव में आ गई परंतु हम यह भी कह सकते हैं कि उसे बहुत कुछ दे भी दिया और कुछ दिया भी नहीं। उनके समर्थक को अध्यक्ष बनाने का फैसला जरूर ले लिया लेकिन चन्नी की खुद अध्यक्ष बनने की हसरत पूरी नहीं हो पाई।

प्रताप सिंह बाजवा।
कांग्रेस में दलित वोटर को फोकस किया है इसीलिए चन्नी का दबाव मानना पड़ा है। यह चन्नी की जीत है जिसे निवृत्तमान अध्यक्ष राजा वडिंग भी स्वीकार कर रहे हैं। देखने की बात यह है कि कांग्रेस का यह फार्मूला दलित मतदाताओं के मन भाएगा या नहीं। आपको बता दें कि पंजाब के निर्णायक मतदाता जट्ट-सिक्ख अभी आम आदमी पार्टी के पक्ष में नजर आ रहे हैं लेकिन वह कांग्रेस में शिफ्ट हो सकते हैं । इसी से हार जीत का फैसला होगा। जानकार मानते हैं कि जट्ट सिक्ख मतदाताओं का भारतीय जनता पार्टी और अकाली दल में ज्यादा इंटरेस्ट नहीं है।
पंजाब में कांग्रेस के लिए नितांत जरूरी है कि वह टिकट वितरण कुछ इस तरह से करें कि लोग यह कहते नजर आए कि ,कांग्रेस ने टिकट बढ़िया तरीके से बांटी हैं। इस मामले में युवाओं को अधिमान देना कांग्रेस के काम आ सकता है। भाजपा ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि कांग्रेस ने टिकट वितरण में ओबीसी को उचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया तो उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। कांग्रेस उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनाव में पूरे दमखम के साथ उतर रही है। संभव है प्रियंका गांधी एक बार फिर पंजाब के चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका में नजर आए। कांग्रेस के मौजूदा फेर बदल से जिस व्यक्ति को सबसे ज्यादा लाभ हुआ है उसका नाम है प्रताप सिंह बाजवा।

