
कितना छोटा था वह बालक,
पर सपनों का आकाश बड़ा था,
नंगे पाँव चलती राहों में भी
आँखों में भारत खड़ा था।
नदी पार कर विद्यालय जाते
उस बालक के पाँव छोटे थे,
पर सपनों की राहें शायद
तब भी बहुत बड़ी थीं।
रास्ते में एक बाग़ पड़ा,
साथियों संग बालमन ठहर गया।
अमरूदों से लदे पेड़ को देखा,
तो मन भी थोड़ा मचल गया।
साथी अमरूद तोड़कर भाग निकले,
पर छोटा-सा वह बालक पकड़ा गया।
माली ने डाँटते हुए कहा—
“चल, तुझे तेरे पिता के पास ले चलता हूँ, चोरी करता है!”
बालक ने सिर झुकाकर धीरे से कहा—
“मेरे पिता नहीं हैं…”
शायद उस एक वाक्य ने
माली के भीतर का कठोरपन पिघला दिया।
स्वर में ममता उतर आई—
“तब तो तुम्हें और भी सबल
और जिम्मेदार होना चाहिए।”
कौन जानता था,
बाग़ में मिला यह छोटा-सा उपदेश
आगे चलकर एक पूरे जीवन का दर्शन बन जाएगा।
वही बालक बड़ा हुआ—
अभावों से लड़ा, कठिनाइयों से गुज़रा,
पर शिकायत को अपना स्वभाव नहीं बनाया।
देश ने जब पुकारा,
तो अपने छोटे-से कद में
एक विराट जिम्मेदारी समेट ली।
न पद का मोह, न वैभव की चाह,
न नाम की कोई प्यास रही;
जिस ऊँचाई तक पहुँचे,
वहाँ भी सादगी साथ रही।
“जय जवान, जय किसान”
सिर्फ दो शब्द नहीं,
भारत की दो मजबूत धड़कनों का सम्मान था—
सीमा पर खड़ा जवान
और खेत में पसीना बहाता किसान।
आज शास्त्री जी को याद करती हूँ,
तो वह अमरूद का बाग़
सिर्फ बचपन की एक घटना नहीं लगता।
वह जैसे जीवन का पहला पाठ था—
परिस्थितियाँ चाहे कितनी कठिन हों,
मनुष्य को अपनी जिम्मेदारी से बड़ा होना चाहिए।

lal bahadur shastri
आज जब ऊँचाई अक्सर
पद और प्रतिष्ठा से नापी जाती है,
शास्त्री जी की सादगी चुपचाप पूछती है—
“ऊँचा होना है,
या केवल ऊँचा दिखाई देना है?”
कद उनका छोटा था,
पर चरित्र इतना विराट
कि आज भी पूरा राष्ट्र
श्रद्धा से सिर झुका देता है।
लाल बहादुर शास्त्री को शत-शत नमन।
—श्री ठाकुर
लेखिका एवं मल्टी-आर्टिस्ट
देवघर, (झारखंड)
