
दक्ष दर्पण समाचार सेवा
अंबाला/पंचकूला। देवभूमि हिमाचल की पृष्ठभूमि से जुड़े और पंजाब में जन्मे सुभाष शर्मा का व्यक्तित्व सादगी, खामोशी, सेवा भाव और दूसरों के लिए जीवन जीने की प्रेरणा से जुड़ा है। कहा जाता है कि “पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं।” बचपन से ही सेवा और सहयोग की भावना उनके व्यक्तित्व का हिस्सा रही।
सुभाष शर्मा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा हिमाचल प्रदेश के प्रागपुर गांव से प्राप्त की, जबकि माध्यमिक एवं उच्च शिक्षा अमृतसर में पूरी की। उनके पिता ओम प्रकाश शर्मा की इच्छा थी कि वे डॉक्टर या इंजीनियर बनें, लेकिन नियति ने उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में लाकर हजारों बच्चों के भविष्य को संवारने का अवसर दिया। मां आशा शर्मा का उन पर अंत तक विश्वास, उनकी मेहनत और लगन ने उन्हें अपने लक्ष्य के प्रति निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
उनके दादा श्री पी.सी. शर्मा डाक विभाग में पोस्ट मास्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। दादी गीता के वे बेहद लाडले पोते रहे। माता-पिता के लिए वे सही मायनों में श्रवण पुत्र, बहनों के लिए आदर्श भाई और अपनी पुत्री प्रियंका के लिए एक प्रेरणादायक पिता रहे हैं।
सुभाष शर्मा को जानने वाले उनके स्वभाव की एक खास बात बताते हैं—जो एक बार उनसे मिलता है, वह उनका होकर रह जाता है। यही कारण है कि उन्हें मिला सम्मान केवल अकादमिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके द्वारा जीवनभर किए गए मानवीय सहयोग और सेवा कार्यों को भी यह सम्मान रेखांकित करता है।
शिक्षा जगत में पहला कदम
वर्ष 1998 में शिक्षा विभाग की चयन प्रक्रिया में प्रथम स्थान प्राप्त किया। उन्होंने एनसीईआरटी, गुरुग्राम के प्रशिक्षण कार्यक्रम में स्वर्ण पदक हासिल किया। 5 मई 1998 को पंचकूला के राजकीय उच्च विद्यालय खेतपुराली में टीजीटी हिंदी अध्यापक के रूप में उन्होंने अपनी शिक्षक सेवा शुरू की।
गांव से शुरू हुआ उनका शिक्षक जीवन जल्द ही विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के मिशन में बदल गया। उन्होंने शिक्षा को केवल कक्षा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि ग्रामीण विद्यार्थियों, विशेषकर बेटियों की शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर भी प्रयास किए। छात्राओं को उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित करने के साथ जरूरत पड़ने पर उनके खर्च में सहयोग किया। गांव की बेटियों के विवाह के अवसर पर भी उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक सहायता प्रदान की।
वर्ष 2007 में पदोन्नति के बाद अंग्रेजी प्रवक्ता बने। शिक्षा के साथ पर्यावरण संरक्षण भी उनके कार्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय खटोली में उन्होंने पौधरोपण को बढ़ावा दिया और विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक किया।
वर्ष 2013 में राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय सेक्टर-6, पंचकूला में सेवाएं शुरू करने के बाद उन्होंने विद्यालय की मूलभूत सुविधाओं को बेहतर बनाने पर विशेष ध्यान दिया। जर्जर शौचालयों के सुधार, खेल मैदान के नवीनीकरण, विद्यालय का गेट लगवाने तथा विद्यार्थियों के लिए वाटर कूलर जैसी सुविधाएं उपलब्ध करवाने में उन्होंने साथियों के सहयोग से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इसके बाद यमुनानगर से होते हुए पंचकूला के टिक्कर हिल्स विद्यालय में भी उन्होंने विद्यार्थियों, विशेषकर दिव्यांग बच्चों की शिक्षा और विकास के लिए विशेष प्रयास किए। जरूरतमंद परिवारों के बच्चों को आगे बढ़ने में सहयोग देना उनके सेवा भाव का हिस्सा रहा।
5 दिसंबर 2025 को प्रधानाचार्य के पद पर पदोन्नत होकर उन्होंने राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय खुडडा कलां, अंबाला में कार्यभार संभाला। विद्यालय में पहुंचते ही उन्होंने छात्राओं के जर्जर शौचालयों, मध्याह्न भोजन कक्ष और अन्य सुविधाओं की स्थिति को प्राथमिकता से सुधारने का प्रयास किया। गैर-सरकारी संगठनों के सहयोग से छात्राओं के लिए शौचालयों का सुधार करवाया, मध्याह्न भोजन कक्ष को नया स्वरूप दिया तथा एनएसक्यूएफ प्रयोगशाला का नवीनीकरण करवाया।
हाल ही में बैंक के सहयोग से विद्यालय की पांच छात्राओं को 5-5 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि भी उपलब्ध करवाई गई, ताकि वे शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित हो सकें।
शिक्षा के क्षेत्र में अपनी सेवाओं के दौरान सुभाष शर्मा ने अपना अधिकांश समय बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए समर्पित किया। उनका मानना है कि विद्यालय केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के सपनों को दिशा देने और उनके व्यक्तित्व को गढ़ने का स्थान है। उनका यह सफर आज भी जारी है और आगे भी उनका प्रयास विद्यालयों तथा विद्यार्थियों के लिए ठोस और सकारात्मक कार्य करने का है।हरियाणा सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा दिया जाने वाला राज्य स्तरीय शिक्षक सम्मान उन्हें और अधिक लगन व निष्ठा से कार्य करने की प्रेरणा देगा।
