
हरविंद्र यादव विशेष खबर की शुरुआत दो लाइनों से करता हूं
गौण भले हो जाऊं लेकिन मोन नहीं हो सकता मैं और पुत्र मोह में शस्त्र त्याग कर द्रोण नहीं हो सकता मैं
गलत सलाहकार, अज्ञानी वक्ता, अनपढ़ विदुर और बुद्धिहीन शकुनि क्या दुर्योधन को समझा नहीं सकते थे… लेकिन कालखंड को कुछ और ही मंजूर था। इतिहास की यही पंक्ति आज फिर अहीरवाल की हवा में तैरती महसूस होती है, जहां सब कुछ सामने होते हुए भी कुछ भी साफ़ दिखाई नहीं देता।
कहते हैं, एक राज्य था—धरती उपजाऊ, लोग सजग, और विश्वास इतना गहरा कि सत्ता को सिर पर बैठाकर सम्मान दिया गया। पर धीरे-धीरे इस राज्य का दरबार बदलने लगा। चेहरे वही रहे, कुर्सियां वही रहीं, पर शब्दों का वजन हल्का हो गया और सच का कद छोटा।
दरबार में अब नीति नहीं, सुविधा बोली जाती है। सलाहकारों की भीड़ बढ़ी, पर सलाह का स्तर गिर गया। जो जितना कम जानता था, वह उतना ही ऊंचा बोलने लगा। और जो सच जानता था, उसने धीरे-धीरे चुप रहना सीख लिया।
कभी विदुर जैसे लोग इस राज्य की पहचान हुआ करते थे, जो सत्ता के सामने भी सच रख देते थे। पर अब या तो वे दरबार के बाहर खड़े कर दिए गए हैं, या फिर उन्होंने खुद को किनारे कर लिया है। भीष्म जैसी प्रतिज्ञाएं अब केवल पद बचाने का माध्यम बन गई हैं और द्रोण जैसी विद्या ने भी शायद समय के आगे घुटने टेक दिए हैं।
महाराज भले ही अंधे न हों, पर दृश्य कुछ ऐसा है मानो देखने की इच्छा ही समाप्त हो चुकी हो। सब कुछ सामने है—फैसलों की दिशा, शब्दों की भाषा, और व्यवस्था की चाल—पर दरबार में हर प्रश्न का एक ही उत्तर गूंजता है… “सब ठीक है।”
गांव की चौपालों से लेकर शहर की गलियों तक अब एक अलग ही चर्चा है। लोग पूछते हैं, पर जवाब नहीं मिलता। आवाज उठती है, पर उसे शोर कहकर दबा दिया जाता है। लोकतंत्र की परिभाषा अब धीरे-धीरे बदल रही है—जहां सवाल पूछना असुविधा माना जाने लगा है और चुप रहना समझदारी।
इस बीच कुछ “प्यादे” ऐसे भी सक्रिय हैं, जिनकी वाणी में वह तीखापन आ गया है, जो कभी इस राज्य की संस्कृति का हिस्सा नहीं था। शब्द अब संवाद के लिए नहीं, बल्कि दबाव के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं। और सबसे बड़ी बात यह कि यह सब दरबार की छाया में हो रहा है, बिना किसी प्रतिरोध के।
इतिहास गवाह है कि महाभारत युद्ध मैदान में नहीं, दरबार की चुप्पी में जन्म लेता है। जब गलत को गलत कहने की हिम्मत खत्म हो जाए, जब सही को सही कहने में डर लगे, और जब सत्ता अपने ही बनाए आईने से नजरें चुरा ले—तब संघर्ष तय हो जाता है।
आज अहीरवाल भी उसी मोड़ पर खड़ा नजर आता है। जहां जनता के सपनों पर प्रश्नचिह्न हैं, फैसलों पर संशय है, और व्यवस्था पर विश्वास धीरे-धीरे कम होता दिख रहा है।
रोम जब जल रहा था, तब नीरो बांसुरी बजा रहा था—यह सिर्फ इतिहास की कहानी नहीं, सत्ता के मौन का सबसे बड़ा प्रतीक है। और जब कोई राज्य भीतर से सुलगता है, तो आग बाहर से नहीं आती, वह उसी चुप्पी से जन्म लेती है जिसे समय रहते तोड़ा नहीं गया।
सब कुछ जानते हुए भी अगर दरबार मौन है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—जिम्मेदारी आखिर किसकी बनती है?
क्योंकि इतिहास नाम नहीं पूछता…
वह केवल यह दर्ज करता है कि—
जब सब जल रहा था… तब कौन मौन था।
