
धर्मपाल वर्मा
दक्ष दर्पण समाचार सेवा
चण्डीगढ़।
राहुल गांधी, जो 2004 से सक्रिय राजनीति में हैं और अब लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं। उन्होंने अब विपक्ष के नेता के रूप में जो आक्रमक रुख अपनाया है और उन्हें जनता ने संसद में हमलावर मुद्रा में देखा है उससे उनकी छवि एक परिपक्व और आक्रामक नेता की बन रही है । विचारशील लोग यह महसूस करते हैं कि राहुल गांधी अन्य राजनेताओं की तरह झूठ फरेब और बात को बढ़ा चढ़ा कर पेश करने की आदत से बहुत दूर रहते हैं ।वह बोलने से पहले खासतौर पर तथ्यों को वेरीफाई जरूर करते हैं । यदि गौर किया जाए तो उन्होंने देश को, विपक्ष को और सत्ता पक्ष को कई बार कई महत्वपूर्ण मौकों पर समय रहते आगाह किया है, चेतावनी भी है और महत्वपूर्ण यह है कि उनकी बातें सच भी साबित हुई हैं ।
कोरोना के समय में वक्त रहते राहुल गांधी ने जो बातें कही थी पहले उन्हें बकवास समझा गया लेकिन बाद में वह सारी चीज सच साबित हुई । उन्होंने चीन के दुस्साहस और सेना के मसलों को भी उठाने का जोखिम मोल लिया जिसे सत्तारुढ़ दल ने अपनी सुविधा अनुसार प्रस्तुत कर उनकी छवि को धूमिल करने की कोशिश की।
अभी इंडो यूस ट्रेड डील के मामले में भी वही हुआ जो राहुल गांधी ने कहा था जिसकी चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि जो ट्रंप कहेगा ,मोदी वहीं करेगा। पूरी दुनिया ने देखा कि हुआ क्या है। राहुल गांधी ने घिनौनी हरकतों के लिए जानी जा रही एपस्टिन फाइल्स को लेकर जिस प्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगियों को लपेटने की हिम्मत दिखाई है वह जनता में चर्चा का विषय बन गई है।
राहुल गांधी पिछले कुछ वर्षों में, विशेष रूप से भारत जोड़ो यात्रा के बाद, अधिक परिपक्व नेता के रूप में उभरे हैं। वे अब अपनी बातों को अधिक आक्रामक और रणनीतिक रूप से रखते हैं। आम जन यह महसूस करने लगा है कि राहुल गांधी मजबूत इच्छा शक्ति के नेता हैं ।वह डरते नहीं और अपनी बात धडल्ले से कहना जानते हैं। देश यह भी देख रहा हैं कि अब राहुल गांधी भारतीय जनता पार्टी से अकेले लोहा ले रहे हैं और इसका लाभ भी अंततोगत्वा कांग्रेस को ही मिलेगा। यदि मैं गलत नहीं हूं तो राहुल गांधी के इस रूप से अब भाजपा के कुछ नेता शायद डरने भी लगे हैं ।इन में वह भी हैं जो यह समझते हैं कि राहुल गांधी कभी सत्ता में आ गए तो वह विरोधियों विशेष कर दोषियों को सबक सिखाने से बाज नहीं आएंगे।
कांग्रेस के उपाध्यक्ष और एन एस यू आई ,इंडियन यूथ कांग्रेस के महासचिव जैसे पदों पर रहने के अलावा, वह चार बार के सांसद भी है। वह उत्तर प्रदेश में अमेठी और रायबरेली के अलावा दक्षिण भारत में केरल से भी सांसद रहे हैं।
भारत जोड़ो यात्रा ने उनकी छवि में सुधार किया और उन्हें एक “जननेता” के रूप में स्थापित करने में मदद की।
वे अब संसद में सरकार को सीधे तौर पर और अधिक मुखर होकर चुनौती देते हैं, जो उनकी परिपक्वता का संकेत है।
2014 और 2019 की हार के बाद, राहुल गांधी ने अपनी कार्यशैली और संवाद में बदलाव करने की कोशिश की है, जिससे वे जनता के बीच अधिक भरोसेमंद लगने लगे हैं।वर्तमान में वे रायबरेली से लोकसभा सांसद और विपक्ष के नेता के रूप में कार्य कर रहे हैं।
हालांकि, विपक्षी दलों और समर्थकों की राय अलग-अलग हो सकती है, लेकिन यह स्पष्ट है कि पिछले एक दशक में उनका राजनीतिक कौशल उभर कर सामने आया है और वह एक परिपक्व और जिम्मेदार नेता के रूप में देखे जाने लगे हैं।
राहुल गांधी की एक दिक्कत यह जरूर है कि पार्टी के अंदर भी बहुत ऐसे नेता विद्यमान है जिन्हें विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता। जो समय-समय राहुल गांधी और पार्टी पर भी नाजायज दबाव बनाते रहते हैं। राहुल गांधी कई बार इस दर्द को उजागर भी करते रहे हैं लेकिन अब उन्होंने पार्टी में आर पार की बात करने का परिचय यह कह कर देना शुरू दिया है कि जो छोड़कर जाना चाहता है बेशक चला जाए मुझे बब्बर शेर कार्यकर्ता और नेता चाहिए।
अगले वर्ष पंजाब और उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने हैं ।यह चुनाव विशेष को तौर पर पंजाब इंडियन नेशनल कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती साबित होने जा रहे हैं। पंजाब में कांग्रेस की सरकार बनी तो कांग्रेस का ग्राफ बहुत ऊपर तक जा सकता है लेकिन बात नहीं बनी तो राहुल गांधी को बहुत दिक्कत पेश आ सकती है। इससे भाजपा और उनके दूसरे विरोधियों के हौसले निश्चित तौर पर बढ़ जाएंगे।
