
दक्ष दर्पण समाचार सेवा
कैथल (कृष्ण प्रजापति): गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व पर सिख जत्थों को पाकिस्तान जाने की अनुमति न देने के केंद्र सरकार के निर्णय ने राजनीतिक हलकों में गहन बहस छेड़ दी है। कुछ लोग इसे धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहे हैं, लेकिन यदि इतिहास और मौजूदा हालात पर नजर डालें तो यह कदम न तो नया है और न ही किसी समुदाय के खिलाफ। यह निर्णय वस्तुतः श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का प्रतीक है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारों की यात्रा कभी आसान नहीं रही। विभाजन के बाद लाखों श्रद्धालुओं की पवित्र स्थलों तक पहुँच लगभग असंभव हो गई। 1965 के युद्ध के बाद सीमापार यात्राएं रुक गईं। हाल के वर्षों में भी कई बार सुरक्षा कारणों से जत्थों को रोका गया जून 2019 में अटारी सीमा पर लगभग 150 श्रद्धालुओं को रोकना पड़ा, कोविड महामारी के दौरान कॉरिडोर लंबे समय तक बंद रहा और मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद जत्थों को वापस लौटना पड़ा।
पाकिस्तान का रवैया भी सवालों के घेरे में रहा है। एक ओर वह सिख धरोहर का रक्षक होने का दावा करता है, वहीं दूसरी ओर अपने ही अल्पसंख्यकों के साथ अमानवीय व्यवहार करता है। भारत से जाने वाले जत्थों को अक्सर खालिस्तानी एजेंडे का सामना करना पड़ा है, जो आस्था से अधिक राजनीतिक चाल है।
हाल ही में पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे माहौल में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को पाकिस्तान भेजना सुरक्षा के साथ गंभीर खिलवाड़ होता। सिख समाज का राष्ट्र की एकता और रक्षा में सदैव अग्रणी योगदान रहा है। यह समुदाय भलीभांति समझता है कि राज्य का पहला कर्तव्य नागरिकों की सुरक्षा है। सरकार का यह निर्णय न तो आस्था पर रोक है और न ही किसी विशेष वर्ग के खिलाफ, बल्कि यह जिम्मेदारी और सुरक्षा की आवश्यकता से प्रेरित कदम है, इसलिए कहा जा सकता है कि यह प्रतिबंध परिस्थितियों की मांग है, नागरिकों का जीवन और राष्ट्र की अखंडता सर्वोपरि है।
