
– डॉ उमेश प्रताप वत्स
@ दक्ष दर्पण
पहलगाम हत्याकांड के बाद भारतीय सेना की कार्यवाही में पाक स्थित नौ आतंकी शिविरों के बर्बाद होने पर भारत और पाकिस्तान सीमित युद्ध से खुले युद्ध की ओर बढ़ते जा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने बिहार रैली में एलान किया था कि 22 अप्रैल को जम्मू कश्मीर के पहलगाम में आतंकियों ने मासूम देशवासियों को जिस बेरहमी से मारा है, उससे पूरा देश व्यथित है। कोटि-कोटि देशवासी दुखी हैं। सभी पीड़ित परिवारों के इस दुख में पूरा देश उनके साथ खड़ा है। इस आतंकी हमले में किसी ने अपना बेटा खोया, किसी ने अपना भाई खोया, किसी ने अपना जीवनसाथी खोया है। करगिल से कन्याकुमारी तक हमारा दुख एक जैसा है। हमारा आक्रोश एक जैसा है। यह हमला निहत्थे पर्यटकों पर नहीं हुआ अपितु देश के दुश्मनों ने भारत की आत्मा पर हमला करने का दुस्साहस किया है। मैं बहुत साफ शब्दों में कहना चाहता हूँ जिन्होंने यह हमला किया है उन आतंकियों और इस हमले की साजिश रचने वालों को उनकी कल्पना से भी बड़ी सजा मिलेगी, सजा मिलकर के रहेगी।अब आतंकियों की बची खुची जमीन को भी मिट्टी में मिलाने का समय आ गया है। एक सौ चालीस करोड़ भारतीयों की इच्छाशक्ति अब आतंक के आकाओं की कमर तोड़कर रहेगी।
चौहदवें दिन भारतीय सेना के रणबाँकुरों ने अपने दूरदृष्टा प्रधानमंत्री के सुझाव को मानते हुए ऑपरेशन का नाम सिंदूर रखते हुए संकल्प लिया कि भारत की बेटियों के सिंदूर का बदला शीघ्र ही पाकिस्तान के अहंकार को चकनाचूर कर लिया जायेगा। इसी सिंदूर ऑपरेशन के अन्तर्गत भारतीय एयरफोर्स ने पाकिस्तान को सबक सिखाते हुए 6 से 7 मई की मध्य रात को 1:05 बजे से लेकर 1:30 बजे तक ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिया। 25 मिनट के इस ऑपरेशन में 24 मिसाइलों के जरिए नौ आतंकी शिविरों को ध्वस्त कर दिया गया। इन नौ ठिकानों में से पांच पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में थे, वहीं चार पाकिस्तान में थे। इन ठिकानों में आतंकियों को भर्ती किया जाता था। उन्हें प्रशिक्षित किया जाता था। उनके दिमाग में जहर भरा जाता था। भारत का यह प्रतिशोध इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 25 साल पहले यानी 1999 में कंधार विमान अपहरण के बाद यात्रियों के बदले रिहा किए गए आतंकी अजहर मसूद के जैश-ए-मोहम्मद का मुख्यालय भी ध्वस्त कर दिया गया है। मोस्ट वॉन्टेड आतंकी हाफिज सईद के संगठन लश्कर-ए-तैयबा का सबसे अहम और बड़ा आतंकी शिविर भी तबाह हो चुका है।दूसरों के निरपराध परिवारों को बेवजह मौत बांटने वाले अजहर मसूद का जब अपने परिवार के सदस्य सैन्य कार्यवाई में मारे गए तो वहीं जालिम मसूद अल्लाह से भीख मांग रहा था कि मुझे भी उठा लेते। इसके बाद पहलगाम में हमला करने आए आतंकियों ने जहां प्रशिक्षण लिया था, वह भी बर्बाद किया जा चुका है। पाक अधिकृत कश्मीर के मुजफ्फराबाद में मौजूद मरकज सैयदना बिलाल कैम्प और पाकिस्तान के सियालकोट स्थित सरजल कैम्प और महमूना जोया कैम्प, ये ऐसे तीन ठिकाने थे, जो अस्पताल-स्वास्थ्य केंद्र की आड़ में चल रहे थे। किसी को शक न हो, इसके लिए यहां कुछ समय इलाज होता था, बाकी समय आतंकियों को प्रशिक्षण दिया जाता था। आगे के कमरों में डॉक्टर मौजूद रहते थे और परदे के पीछे आतंकी।
भारत ने संयम रखते हुए ऑपरेशन सिंदूर में विशेष ध्यान रखा कि पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठानों, रिहाइशी इलाकों और आम नागरिकों को नुकसान न पहुंचे। पाक अधिकृत कश्मीर में पांच कैम्प नष्ट किए गए। आपरेशन सिंदूर के दौरान सबसे पहला हमला सवाई नाला स्थित आतंक के अड्डे पर किया गया। ये लश्कर ए तोएबा का ट्रेनिंग सेंटर था। लाइन ऑफ कंट्रोल से 30 किलोमीटर दूर है। पहलगाम हत्याकांड में शामिल आतंकियों ने यहीं से प्रशिक्षण लिया था। सईदना बिलाल कैम्प, मुजफ्फराबाद में जैश ए मोहम्मद का यह अड्डा हथियार, विस्फोटक और जंगल सरवाइवल की ट्रेनिंग का केंद्र था। गुलपुर कैम्प, कोटली एलओसी से 30 किलोमीटर दूरी पर लश्कर ए तोएबा का बेसकैंप था, जो रजौरी और पूंछ में सक्रिय था। 20 अप्रैल 2023 को पूंछ में और 9 जून 2024 को रियासी में तीर्थ यात्रियों की बस पर हमले में शामिल आतंकियों को यहीं से ट्रेंड किया गया था। बरनाला कैम्प, भीमबर एलओसी से 9 किलोमीटर दूर है। यहां पर हथियार चलाने, आईईडी बम बनाने और जंगल सरवाइवल प्रशिक्षण का केंद्र था। अब्बास कैम्प, कोटली एलओसी से 13 किलोमीटर दूर है। लश्कर ए तोएबा के फिदायीन यहां पर तैयार होते थे। इसी तरह पाकिस्तान के अंदर भी भारत ने चार कैम्प नष्ट किए।सरजल कैम्प, स्यालकोट अंतराष्ट्रीय सीमा से 6 किलोमीटर की दूरी पर सांबा, कठुआ के सामने स्थित है। मेहमूना जोया कैम्प, स्यालकोट अंतराष्ट्रीय सीमा से 12-18 किलोमीटर दूर, यह हिजबुल मुजाहिद्दीन का बहुत बड़ा कैम्प था। पठानकोट एअरबेस पर किया गया हमला इसी कैम्प से प्लान और डायरेक्ट किया गया था। मरकज़ तोएबा, मुरीदके- यह अंतराष्ट्रीय सीमा से 18-25 किलोमीटर दूर था। 2008 मुंबई हमले के आतंकियों को यहां पर प्रशिक्षित किया गया था। मुंबई हमले में शामिल अजमल कसाब और डेविड हेडली को भी यहीं पर प्रशिक्षित किया गया था। मरकज़ सुभानअल्लाह , बहावलपुर अंतराष्ट्रीय सीमा से 100 किलोमीटर दूर था। ये जैश-ए-मोहम्मद का मुख्यालय था। यहां पर आतंकियों की भर्ती और प्रशिक्षण का केंद्र भी था। भारतीय सेना के प्रवक्ता ने बताया कि पहलगाम हमला स्पष्ट रूप से कश्मीर में बहाल हो रही सामान्य स्थिति को बाधित करने के उद्देश्य से किया गया। जांच और सूचनाओं के आधार पर की गई इस नपी तुली कार्रवाई का उद्देश्य आतंक के ढांचे को समाप्त करना और भारत भेजे जाने वाले संभावित आतंकियों को अक्षम बनाने पर था। भारत ने यह भी ऐलान किया कि उसने पहलगाम का बदला ले लिया है, अब वह इसे आगे बढ़ाने के मूड में नहीं है किंतु यदि पाक इसे आगे बढ़ाता है तो मुँह तोड जवाब दिया जायेगा ।फिर भारत से ही गिडगिड़ाकर अपील करने लगा। शनिवार को सांय पांच बजे सीजफायर की घोषणा हुई। आम लोगों ने चैन की सांस ली किंतु चार घंटे के बाद ही पाकिस्तान ने फिर जम्मू-कश्मीर एवं राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में ड्रोन हमला कर सीजफायर का उलंघन किया। धोखेबाज पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए भारतीय सेना ने पाक द्वारा छोड़े गये लगभग चारसौ ड्रोन बर्बाद कर अपनी सतर्कता का उदाहरण प्रस्तुत किया। जब पूरा विश्व भारतीय सेना की सफल कहानी के गीत गा रहा था, तब पाकिस्तान घुटनों में सिर देकर सिसक-सिसक रो अपनी बर्बादी का दृश्य देख रहा था। उसके हमसफर तुर्किए व चीन भी उसका दर्द बांटने में अपनी विवशता का रोना रो रहे हैं। जब पूरा विश्व भारत के साहस, आत्मविश्वास व सुगठित योजनाओं से हतप्रभ है तो देश में कुछ लोग यह नैरेटिव सैट करने में लगे हैं कि भारत दबाव में आकर सीजफायर के लिए तैयार हुआ है। यद्यपि देश की जनता चाहती है कि इस बार आर-पार करके पाक अधिकृत कश्मीर ले ही लेना चाहिए किंतु हमारे प्रधानमंत्री जो सोचते हैं उसे कर गुजरते हैं। वे पाकिस्तान को घुटनों पर ला कर इस कद्र विवश कर देना चाहते हैं कि पाकिस्तान स्वयं कहे कि आप अपना अधिकृत कश्मीर ले लो और हमारी जान बख्श दो। वर्तमान में पाक को अपने अंदर से भी बलुचिस्तान आदि से चुनौती मिल रही है। बहुत जल्द ही पाक अधिकृत कश्मीर हमारा हिस्सा होगा और स्वयं पाकिस्तान ही हमारे सुपुर्द करेगा, ऐसा हमारा विश्वास है ।

स्तंभकार :
डॉ उमेश प्रताप वत्स
