
कबीर मरने के बाद फूल बन गये और हिन्दू और मुस्लिमो ने उन्हें बराबर बांट लिया, जबकि सचाई यह है कि सिकंदर लोधी ने उन्हें हाथी के पैरो से कुचलवाकर मरवा दिया था, क्योंकि वे इस्लामी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध भी प्रचार करते थे और कबीर ने इस्लाम स्वीकार कर के मुसलमान बनने से मना कर दिया था ।
जब कबीर दास जी ने इस्लाम कबूल करने से मना कर दिया,तो सिकंदर लोदी के आदेश से जंजीरो में जकड़कर कबीर को मगहर लाया गया । वहां लाते ही जब शहंशाह के हुक्म के अनुसार कबीर को मस्त हाथी के पैरों तले रौंदा जाने लगा, तब लोई पछाड़ खाकर पति के पैरों पर गिर पड़ी । पुत्र कमाल भी पिता से लिपटकर रोने लगा लेकिन कबीर तनिक भी विचलित नहीं हुए । आंखों में वही चमक बनी रही, चेहरे की झुर्रियों में भय का कोई चिन्ह नहीं उभरा । एकदम शान्त-गम्भीर वाणी में शहंशाह को सम्बोधित हो कहने लगे –
“माली आवत देखिकर, कलियन करी पुकार ।
फूले फूले चुन लिए, काल्हि हमारी बार ।।”
और फिर इतना कहते ही हलके से मुस्कुरा दिया । कबीर आगे बोले-‘मुझे तो मरना ही था; आज नहीं मरता तो कल मरता । लेकिन सुलतान कब-तक इस गफलत में भरमाए पड़े रह सकेंगे, कब तक फूले-फूले फिरेंगे कि वह नहीं मरेंगे ?
‘ऊपर ये जो छंद है यह कबीर के मरते वक्त ही रचा गया था और कबीर ग्रंथावली के अंत में भी जोड़ा गया है..!!
साभार Rudrajik
