
दक्ष दर्पण
गुरुग्राम: श्री माता शीतला देवी श्राइन बोर्ड के पूर्व सदस्य एवं आचार्य पुरोहित संघ के अध्यक्ष पंडित अमरचंद भारद्वाज ने बताया कि इस वर्ष पितृपक्ष का शुभारंभ 26 सितंबर, शनिवार को पूर्णिमा श्राद्ध से होगा और 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या पर समापन होगा। पंचांग में अष्टमी तिथि के क्षय के कारण सप्तमी-अष्टमी का श्राद्ध 3 अक्टूबर को संयुक्त रूप से किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि श्राद्ध का मूल भाव श्रद्धा, कृतज्ञता और पूर्वजों के प्रति सम्मान है। तर्पण, पिंडदान, अन्न, भोजन एवं दान के माध्यम से पितरों का स्मरण करने की परंपरा रही है। सामान्यतः पूर्वज के देहांत की तिथि के अनुसार कर्म किया जाता है। मृत्यु तिथि ज्ञात न होने या निर्धारित दिन पर कर्म न हो पाने की स्थिति में सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है। पंडित अमरचंद ने कहा कि इन दिनों क्रोध, कलह, छल-कपट और अनावश्यक विवाद से बचते हुए शुचिता एवं संयम रखना चाहिए। धार्मिक परंपरा के अनुसार मांस, मछली, अंडा, मदिरा तथा प्याज-लहसुन का त्याग किया जाता है। विवाह, गृहप्रवेश जैसे बड़े मांगलिक आयोजनों से भी सामान्यतः परहेज रखा जाता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि परिवार में किसी महिला को मासिक धर्म होने पर उसका अपमान या तिरस्कार नहीं किया जाना चाहिए। यह प्राकृतिक प्रक्रिया है। ऐसी परिस्थिति में परिवार का अन्य सदस्य यथाशक्ति ब्राह्मण को सीधा और दक्षिणा दे सकता है अथवा परिस्थितिनुसार अमावस्या को कर्म किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि पूर्वजों के प्रति सम्मान के साथ जीवित माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा भी धर्म का महत्वपूर्ण दायित्व है।पंडित अमरचंद ने बताया कि महाभारत के अनुशासन पर्व में महर्षि निमि से संबंधित श्राद्ध प्रसंग मिलता है। दानवीर कर्ण की प्रसिद्ध कथा भी पितृपक्ष की धार्मिक परंपरा से जुड़ी है, जिसका संदेश पूर्वजों के निमित्त अन्न और जल अर्पित करने की भावना से जोड़ा जाता है। सनातन परंपरा में देवऋण, ऋषिऋण, समाजऋण और पितृऋण का विचार भी मिलता है।
सामर्थ्य के अनुसार अपनाएं सरल विकल्प
उन्होंने कहा कि यदि किसी परिवार के लिए विस्तृत व्यवस्था, ब्राह्मण भोजन अथवा दक्षिणा संभव न हो तो श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार आमश्राद्ध या हिरण्य श्राद्ध जैसे विकल्प अपनाए जा सकते हैं।
आमश्राद्ध में यथाशक्ति अनाज, चावल, घी, तेल, शक्कर, नारियल, सुपारी, पान आदि सामग्री ताम्रपात्र में रखकर ‘आमन्नस्थ श्री महाविष्णवे नमः’ का उच्चारण करते हुए चंदन, अक्षत, पुष्प और तुलसी अर्पित किए जाते हैं। सामग्री को पुरोहित, वेदपाठशाला, गोशाला अथवा देवस्थान में दान किया जा सकता है।
हिरण्य श्राद्ध में संकल्प, कुश और काले तिल के साथ पितरों का स्मरण करते हुए यथाशक्ति दक्षिणा, कच्ची सामग्री एवं फल आदि अर्पित किए जाते हैं। पंडित अमरचंद ने कहा कि श्राद्ध का उद्देश्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि श्रद्धा और कृतज्ञता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी परिस्थितियों के अनुसार पूर्वजों का स्मरण करे, यथाशक्ति तर्पण एवं दान करे और जरूरतमंदों की सहायता के साथ अपने माता-पिता तथा बुजुर्गों की सेवा को जीवन का महत्वपूर्ण धर्म माने।
( नोटः खबर के साथ कथावाचक पं. अमर चन्द भारद्वाज का छाया चित्र )
सादर प्रेषित –
कथावाचक पं. अमर चन्द भारद्वाज
अध्यक्ष: आचार्य पुरोहित संघ, गुरुग्राम
सम्पर्क सूत्र:9210724672
