
महेश कौशिक
रोहतक।।
“तू इधर-उधर की न बात कर, ये बता कि क़ाफ़िला कैसे लुटा? मुझे रहज़नों से गिला तो है, पर तेरी रहबरी का सवाल है” का जवाब मांग रहा हरियाणा।
हरियाणा की राजनीति में दो महीने पहले एक माहौल तैयार हुआ कि 2029 के चुनाव में कांग्रेस की ओर से दीपेंद्र हुड्डा सारे खेल के नायक होंगे। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ देश भर से कांग्रेस के सांसद, हरियाणा के विधायक उनके दिल्ली निवास पर पहुँचे। हरियाणा में दीपेंद्र की लोकप्रियता का डंका सिर चढ़कर बोलने लगा और कांग्रेस के समर्थकों को पूरी उम्मीद जग गई थी।
कांग्रेस ने पिछले विधानसभा चुनाव में दलित समाज की नेत्री सैलजा के कारण हुए नुकसान और भविष्य में उनकी काट के रूप में राज्यसभा में एक ऐसा चेहरा दिया, जो दलित समाज की हार्डकोर राजनीति कर सके। करमबीर बौद्ध भले ही नया चेहरा थे, लेकिन दलित समाज में पकड़ बनाने के लिए उतारे गए उम्मीदवार को लेकर जिस प्रकार का संदेश कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में जाना था, उसमें दीपेंद्र हुड्डा बिल्कुल फिसड्डी साबित हुए।
37 विधायक होने के बाद भी इनेलो की कृपा से चुनाव जीते करमबीर बौद्ध का समाज आज कांग्रेस की अपेक्षा अभय चौटाला का धन्यवाद कर रहा है। दलित समाज एक ही बात कह रहा है कि जब दीपेंद्र हुड्डा अपने सभी कार्यक्रमों में सभी विधायकों को एकजुट दिखाकर भविष्य में अपने आप को मुख्यमंत्री का दावेदार बनवाने में सफल होते हैं, तो राज्यसभा में भगदड़ कैसे हो गई, क्योंकि राज्यसभा चुनाव की सारी कमान दीपेंद्र हुड्डा के हाथ में थी।
आज कांग्रेस के लोग यही पूछ रहे हैं कि एक-तिहाई विधायक किसकी सह पर या किससे नाराज़ होकर खेला कर गए। क्या दीपेंद्र हुड्डा का नेतृत्व उन्हें पसंद नहीं था, या पार्टी में वे खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे थे। कांग्रेस से जुड़े एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह सब प्री-प्लान था। हुड्डा परिवार इस चुनाव में कई नेताओं को ‘खड्डे लाइन’ लगाना चाह रहा था।
अब बात नेतृत्व की करें तो कांग्रेस इस चुनाव में जीतकर भी हार चुकी है। कांग्रेस यदि अपने 37 विधायक एकजुट रखकर वोट डलवा पाती, तो वह इनेलो को भी बोलने का मौका नहीं देती और दीपेंद्र का कद बढ़ता, साथ ही सैलजा का नेपथ्य में जाना भी लगभग तय था। लेकिन इस चुनाव में दीपेंद्र हुड्डा के साथ न खुदा मिला, न विसाले सनम—यानि न तो वे अपने नेतृत्व को साबित कर पाए और न ही इनेलो की बोलती बंद कर पाए।
अब पार्टी में मचे घमासान के बाद टूटते विधायकों के घर जाकर मनाने की नौबत आ पड़ी है। अब हुड्डा परिवार चाहे कितने ही इनेलो और बीजेपी पर आरोप लगा ले, लेकिन उनका नेतृत्व कटघरे में खड़ा हो गया है। दीपेंद्र हुड्डा अपनी पहली परीक्षा में कम्पार्टमेंट में रह गए, या यूँ कहें कि मेरिट में आने की बजाय ग्रेस मार्क्स से पास हुए हैं।
अब चाहे लाख बहाने बनाए जाएँ और कुछ भी कहा जाए, लेकिन हर आदमी यही पूछ रहा है कि—
“तू इधर-उधर की न बात कर, ये बता कि क़ाफ़िला कैसे लुटा? मुझे रहज़नों से गिला तो है, पर तेरी रहबरी का सवाल है”—
का जवाब हुड्डा परिवार को देना होगा।
