अमर शहीद कोतवाल धन सिंह गुर्जर भारत के युवाओं के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत –राजेश नागर। अमर शहीद कोतवाल धन सिंह गुर्जर का बलिदान भारत के स्वाभिमान, स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों की नींव है–चौधरी ओमप्रकाश देवी नगर

नन्द सिंगला
दक्ष दर्पण समाचार सेवा
पंचकूला।
मेरठ स्थित चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में आज़ादी के प्रथम संग्राम के महानायक और 1857 की क्रांति के अमर शहीद कोतवाल श्री धन सिंह गुर्जर जी के जन्मोत्सव सप्ताह (19 से 27 नवंबर 2025) के उपलक्ष्य में एक भव्य अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस गरिमामयी अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में माननीय राजेश नागर जी, मंत्री हरियाणा सरकार, तथा शिवालिक विकास बोर्ड के चेयरमैन एवं गुर्जर समाज कल्याण परिसद, हरियाणा के अध्यक्ष चौधरी ओमप्रकाश देवीनगर जी ने विशेष उपस्थिति दर्ज कराई।
कार्यक्रम में देश-विदेश से आए विद्वानों, शोधकर्ताओं, साहित्यकारों और इतिहासकारों ने भाग लिया। उन्होंने 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में कोतवाल धन सिंह गुर्जर जी की निर्णायक भूमिका, उनके अदम्य साहस, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रभक्ति पर विस्तृत प्रकाश डाला। संगोष्ठी में उनके जीवन संघर्ष, वीरता और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उठाए गए ऐतिहासिक कदमों की महत्वपूर्ण चर्चा की गई।
अपने संबोधन में माननीय राजेश नागर जी ने कहा कि धन सिंह गुर्जर जैसे वीरों की गाथाएँ भारत के युवाओं के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेंगी। उन्होंने बताया कि 10 मई 1857 को मेरठ की धरती से उठी क्रांति की चिंगारी को प्रज्वलित करने में धन सिंह गुर्जर जी की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी। कोतवाल पद पर रहते हुए उन्होंने न केवल 839 कैदियों को मुक्त कराया, बल्कि अंग्रेज अधिकारी कर्नल जोन्स को मारकर विद्रोह को निर्णायक दिशा दी।
शिवालिक विकास बोर्ड के चेयरमैन चौधरी ओमप्रकाश देवीनगर ने अपने उद्बोधन में कहा कि इस प्रकार के आयोजन हमारी वीर परंपरा को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि धन सिंह गुर्जर का बलिदान भारत के स्वाभिमान, स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों की नींव है, जिसे सदैव स्मरण रखा जाना चाहिए।
इतिहासकारों ने बताया कि शहीद कोतवाल धन सिंह गुर्जर का जन्म 27 नवंबर 1820 को गाँव पांचाली, जिला मेरठ में हुआ था। 9 मई 1857 को सिपाहियों पर जबरन चर्बी लगे कारतूस थोपे जाने के विरोध में हुए विद्रोह के बाद उत्पन्न परिस्थितियों में उन्होंने ग्रामीणों के सहयोग से कैदियों को मुक्त कराया और “मारो फिरंगी” का नारा बुलंद करते हुए आज़ादी की लड़ाई को नेतृत्व दिया। 4 जुलाई 1857 को अंग्रेजों ने पांचाली और गगोल गाँव पर तोपों से हमला कर लगभग 40 लोगों को फांसी पर लटका दिया और करीब 400 लोगों को शहीद किया। इसी बलिदान से प्रेरित होकर देशभर में 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तीव्र रूप में फैल गया।
