
दक्ष दर्पण समाचार सेवा
चण्डीगढ़।
सूर्यषष्ठी अथवा छठ का पर्व मुख्य रूप से भगवान सूर्य का व्रत है। यह व्रत बिहार में सर्वाधिक प्रचलित है। इस व्रत के बारे में
जानकारी देते हुए पंडित रवि दत्त शास्त्री ने बताया कि इस व्रत में भगवान सूर्य की पूजा की जाती है और उदयगामी एवं अस्तगामी सूर्य को अर्ध दिया जाता है। इस व्रत में प्रसाद मांग कर खाने का विधान है। उन्होंने कहा कि स्कंद पुराण के
अनुसार कार्तिक शुक्ल पक्ष पंचमी को एक बार भोजन करना चाहिए। तदोपरांत षष्ठी के दिन प्रातः काल व्रत का संकल्प लेते हुए पूरे दिन निराहार रहना चाहिए। वाक संयम रखना चाहिए। फिर किसी नदी के किनारे जाकर फूल, फल, घृत नवैध, धूप, दीप आदि से भगवान सूर्य का पूजन करना चाहिए। लाल चंदन और लाल पुष्प भगवान सूर्य की पूजा में विशेष रूप से रखने चाहिए और अंत में ताम्रपत्र में शुद्ध जल लेकर उसमें रोली, पुष्प, अक्षत डालकर उस जल को भगवान सूर्य को अर्ध कर देना चाहिए। उन्होंने बताया कि इस दिन सूर्य भगवान के साथ माता षष्ठी की भी पूजा की जाती है।
छठ पूजा हर साल कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से सप्तमी तिथि तक चार दिनों तक चलने वाला महापर्व है, जिसमें मुख्य रूप से सूर्य देव और छठी मैया की पूजा होती है। नहाय-खाय से लेकर भगवान सूर्य को अर्घ्य देने तक चलने वाले इस पर्व की शुरुआत महाभारत काल से मानी गयी है।
इस दिन मुख्य रूप से भगवान सूर्य की पूजा की जाती है। हिंदू धर्म में सूर्य को साक्षात भगवान माना गया है, क्योंकि वे रोज हमें दर्शन देते हैं और उन्हीं के प्रकाश से हमें जीवनदायिनी शक्ति प्राप्त होती है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, रोज सूर्य की उपासना करने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं।
