दक्ष दर्पण समाचार सेवा
पंचकूला, 28 अगस्त।
इंडियन नेशनल लोकदल के प्रदेश कोषाध्यक्ष एवं पंचकूला शहरी जिलाध्यक्ष मनोज अग्रवाल ने पंचकूला नगर निगम की बिगड़ती वित्तीय स्थिति पर भाजपा सरकार और नगर निगम प्रशासन को घेरते हुए कहा कि जिस नगर निगम के पास वर्ष 2024-25 में ₹138.74 करोड़ का नगद मुनाफा था, वह एक वर्ष बाद ₹22.84 करोड़ के घाटे में कैसे पहुंच गया, इसका जवाब निगम को पंचकूला की जनता को देना होगा।
एक अंग्रेजी अखबार की 23 अगस्त 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, नगर निगम का राजस्व ₹307.34 करोड़ से घटकर ₹167.65 करोड़ रह गया, जबकि खर्च ₹168.60 करोड़ से बढ़कर ₹190.50 करोड़ हो गया। सबसे गंभीर स्थिति टैक्स से होने वाली आय की है, जो ₹159.82 करोड़ से गिरकर केवल ₹40.54 करोड़ रह गई।
मनोज अग्रवाल ने कहा कि यह आंकड़े केवल घाटे की कहानी नहीं बताते, बल्कि नगर निगम व्याप्त भ्रष्टाचार, राजस्व वसूली और वित्तीय प्रबंधन, की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हैं।
मनोज अग्रवाल ने कहा कि जून 2026 में सामने आई जानकारी के अनुसार पंचकूला नगर निगम के पास लगभग ₹108 करोड़ का प्रॉपर्टी टैक्स बकाया था। इनमें ₹2 लाख से अधिक बकाया वाले बड़े बकायेदारों पर ही लगभग ₹40 करोड़ की राशि बताई गई।
उन्होंने सवाल किया कि जब नगर निगम को अपनी आय बढ़ाने की जरूरत है और करोड़ों रुपये का टैक्स बाजार में फंसा हुआ है, तो वसूली की प्रभावी व्यवस्था क्यों नहीं की जा रही? प्राप्त जानकारी के अनुसार जुलाई 2026 में 697 बड़ी संपत्तियों पर लगभग ₹37.68 करोड़ का प्रॉपर्टी टैक्स बकाया था। इनमें सरकारी संपत्तियों पर ही करीब ₹11.73 करोड़ बकाया बताया गया था।
मनोज अग्रवाल ने कहा कि सरकारी विभागों से टैक्स की वसूली न कर पाने वाला निगम आम नागरिकों पर टैक्स का बोझ डालकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।
मनोज अग्रवाल ने कहा कि सरकारी संपत्तियों का टैक्स बकाया कोई नया मामला नहीं है। वर्ष 2023 में भी सरकारी विभागों पर करोड़ों रुपये के प्रॉपर्टी टैक्स बकाये की रिपोर्ट सामने आई थी।
उन्होंने कहा कि अगर सरकारी विभाग ही नगर निगम का टैक्स समय पर नहीं देते तो सरकार को पहले अपने विभागों से वसूली सुनिश्चित करनी चाहिए। बडा सवाल यह है कि आम दुकानदार या मकान मालिक से टैक्स वसूलने के लिए नोटिस और कार्रवाई की चेतावनी दी जाती है, लेकिन सरकारी विभागों के करोड़ों रुपये बकाया रहने पर वही सख्ती क्यों नहीं दिखाई जाती?
मनोज अग्रवाल ने मांग की है कि जब निगम में घाटा बढ़ रहा है तो दिखावटी कामों की प्राथमिकता क्यों दी जा रही है? एक तरफ तो नगर निगम अपनी आय बढ़ाने में विफल हो रहा है, दूसरी तरफ ऐसे कामों और परियोजनाओं पर खर्च को लेकर सवाल उठते रहे हैं जिन्हें जनता की तत्काल प्राथमिकताओं की तुलना में कतई जरूरी नहीं माना जा सकता है। पंचकूला में नए प्रवेश द्वारों पर करीब ₹1.50 करोड़ खर्च कर दिए गए हैं जबकि पुराने प्रवेश द्वारों की हालत पर भी सवाल उठ रहे हैं, तो नए प्रवेश द्वारों पर करोड़ों रुपये खर्च करने का क्या ओचित्य है।
इसी प्रकार शहर से गुजरने वाले बरसाती नालों के सौंदर्यीकरण/पुनर्जीवन जैसी बड़ी परियोजनाओं की अनुमानित लागत ₹95.42 करोड़ तक बताई गई है।
मनोज अग्रवाल ने कहा हम विकास के विरोधी नहीं हैं। लेकिन जब नगर निगम घाटे में हो, टैक्स के ₹108 करोड़ बकाया हों और सरकारी विभागों पर भी करोड़ों रुपये बकाया हों, तब हर बड़े प्रोजेक्ट की प्राथमिकता, लागत और उपयोगिता पर सार्वजनिक जवाबदेही जरूरी है।
उन्होंने कहा कि पंचकूला को फोटो खिंचवाने वाला विकास नहीं, बल्कि साफ-सफाई, सड़क, स्ट्रीट लाइट, जल निकासी और मजबूत नगर निगम चाहिए।
मनोज अग्रवाल ने मांग की कि पंचकूला नगर निगम की वित्तीय स्थिति पर सरकार तत्काल श्वेत पत्र जारी करे और पिछले पांच वर्षों की पूरी वित्तीय स्थिति जनता के सामने रखे।
मनोज अग्रवाल ने कहा कि “नगर निगम जनता के पैसे से चलता है और जनता को हर रुपये का हिसाब मांगने का अधिकार है। भाजपा सरकार को यह बताना होगा कि पंचकूला नगर निगम की आर्थिक हालत इस स्थिति तक क्यों पहुंची और इसके लिए जवाबदेही किसकी है।”
उन्होंने मांग की कि नगर निगम की वित्तीय स्थिति का स्वतंत्र विशेष ऑडिट कराया जाए और रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए, ताकि पंचकूला की जनता को पता चल सके कि उसकी कमाई का पैसा कहां से आया, कहां खर्च हुआ और नगर निगम आज घाटे में क्यों पहुंचा।

मनोज अग्रवाल।
