!! “हरिशयनी एकादशी पर हरिहर की भक्ति रचनाओं से सजी रही कल्पकथा काव्यगोष्ठी” !!
“!! मानवता सनातन संस्कृति का मूल उद्देश्य है – कल्पकथा परिवार !!”
सद साहित्य, सनातन संस्कृति और सांस्कृतिक चेतना के नवप्रवाह की अनूठी मिसाल रही २०४वीं साप्ताहिक काव्यगोष्ठी
सृजनशीलता जब श्रद्धा से संवलित हो, और शब्दों में भक्ति का स्वर लहराए, तब एक अद्भुत आध्यात्मिक आनंद का संचार होता है। ऐसे ही दिव्य अनुभूतिपरक क्षणों का साक्षी बना कल्पकथा साहित्य संस्था का २०४वाँ ऑनलाइन साप्ताहिक काव्य आयोजन, जो हरिशयनी एकादशी के पावन अवसर पर हरिहर – अर्थात् भगवान विष्णु एवं भगवान शंकर – की भक्तिपूर्ण आराधना को समर्पित रहा।
यह काव्यगोष्ठी न केवल कवित्व की कलात्मकता का उद्गार बनी, वरन् सनातन संस्कृति की उस अमर ज्योति को भी उजागर करती रही, जो मानवता की चेतना को दिव्यता प्रदान करती है।
कार्यक्रम का शुभारंभ नागपुर (महाराष्ट्र) से जुड़े वरिष्ठ सृजनकार श्री विजय रघुनाथराव डांगे जी द्वारा संगीतमयी गुरुवंदना, गणेशवंदना एवं सरस्वती वंदना के मधुर स्वरों से हुआ। यह मंगलाचरण वातावरण को भक्ति और श्रद्धा की गहन अनुभूति से आप्लावित कर गया।
गोष्ठी का संचालन आशुकवि श्री भास्कर सिंह “माणिक” जी एवं दीदी श्रीमती राधा श्री शर्मा जी ने अपनी सहज, संगीतमयी और भावप्रधान शैली में संयोजन करते हुए किया।
कार्यक्रम में भोलेनाथ की सती त्याग लीला, श्रीहरि की शयन यात्रा, माँ जगदम्बा की करूणामयी वंदना, कृष्ण और भोलेनाथ के हरिहर स्वरूप एक दूसरे का जयघोष करते हुए युद्ध और सनातन संस्कृति के महात्म्य पर आधारित रचनाओं ने रस, छंद, भाव और अलंकार के विविध सोपानों पर साहित्य को सुसज्जित किया।
साहित्यिक मंच पर प्रस्तुत कवियों की रचनाएँ आध्यात्मिकता, भक्ति, राष्ट्रप्रेम, सांस्कृतिक चेतना और लोकजीवन की अनुभूतियों से अभिसिंचित रहीं।
गोष्ठी की अध्यक्षता बेंगलुरु, कर्नाटक से जुड़े विद्वान साहित्यकार डॉ. अनिल कुमार उपाध्याय जी ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा:
“कल्पकथा की यह श्रृंखला केवल काव्य प्रस्तुति नहीं, अपितु सनातन संस्कृति के जीवंत प्रवाह की पुनःस्थापना है। यह मंच विचार और विश्वास, काव्य और संस्कृति, श्रद्धा और सृजन का त्रिवेणी संगम बन चुका है।”
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित नकुड़ सहारनपुर (उप्र) के वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुनील कुमार खुराना जी ने संस्था के प्रयासों को अनुकरणीय बताते हुए कहा:
“सद साहित्य और सनातन संस्कृति को समर्पित इस प्रयास में जो सातत्य और समर्पण है, वह आज के समाज में दुर्लभ है। ऐसे आयोजनों की व्यापक आवश्यकता है।”
कार्यक्रम में रोचक धार्मिक प्रश्नोत्तरी विशेष आकर्षण का केंद्र रही जिसमें सनातन ग्रंथों, देवगाथाओं, व्रत कथाओं, और मंदिर परंपराओं से जुड़े विविध प्रश्नों पर प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता निभाई।
वहीं, पंडित अवधेश प्रसाद मिश्र “मधुप” जी द्वारा कैमूर, बिहार स्थित मुण्डेश्वरी माता मंदिर की तीर्थयात्रा का संक्षिप्त वृतांत प्रस्तुत किया गया, जिसमें मंदिर की पौराणिक महत्ता, वास्तुशिल्प, तांत्रिक परंपरा और देवी उपासना की दिव्यता को बड़े भावपूर्ण ढंग से साझा किया गया। यह प्रस्तुति उपस्थित साहित्य साधकों को भावविभोर कर गई।
इस आयोजन में सहभागी रचनाकार विजय रघुनाथराव डांगे नागपुर महाराष्ट्र, सुनील कुमार खुराना नकुड सहारनपुर उप्र, कविता नेमा काव्या सिवनी मप्र, पं. अवधेश प्रसाद मिश्र मधुप वाराणसी उप्र, डॉ. अनिल कुमार उपाध्याय बेंगलुरु कर्नाटक, ज्योति प्यासी जबलपुर मप्र, भास्कर सिंह माणिक कोंच जालौन उप्र, साधना मिश्रा विंध्य लखनऊ उप्र, नंदकिशोर बहुखंडी देहरादून उत्तराखंड, प्रमोद पटले रायपुर छत्तीसगढ़, डॉ. मंजू शकुन खरे दतिया मप्र, श्री दुर्गादत्त मिश्र “बाबा” भोरे, गोपालगंज बिहार, श्रीमती राधा श्री शर्मा सोनीपत हरियाणा, पवनेश मिश्रा कल्पकथा परिवार, आदि ने भक्ति एवं सृजन के अमृत से सिंचित किया।
संवाद प्रभारी श्रीमती ज्योति राघव सिंह जी ने बताया कि यह आयोजन पौराणिक प्रसंगों की प्रासंगिकता, संस्कृति की स्थायित्वता एवं साहित्य की सात्विकता का संगम रहा। उन्होंने सभी सहभागियों का अभिनंदन करते हुए अगली गोष्ठी हेतु शुभकामनाएँ दीं।
कार्यक्रम के समापन पर संस्था संस्थापक श्री पवनेश मिश्रा जी ने कहा: “मानवता ही सनातन संस्कृति का मूल उद्देश्य है। जब हम साहित्य में धर्म, भाव और श्रद्धा के स्वर पिरोते हैं, तब ही वह जीवनोपयोगी बनता है।” उन्होंने शांति पाठ “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के साथ सभी सहभागियों को कृतज्ञतापूर्वक आभार ज्ञापित किया।
कुल मिलाकर कल्पकथा साहित्य संस्था निरंतरता, निष्ठा और नवचेतना के साथ साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक आयोजनों को साधने हेतु प्रतिबद्ध है।
जय सनातन! जय साहित्य! लिखते रहिए, पढ़ते रहिए, बढ़ते रहिए।
