भूपेंद्र सिंह हुड्डा के भविष्य को लेकर रामचंद्र जांगड़ा के दावे का औचित्य !

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डीपी वर्मा

दक्ष दर्पण समाचार सेवा dakshdarpan2022@gmail.com चंडीगढ़
पिछले दिनों राज्यसभा सांसद और भाजपा के नेता रामचंद्र जांगड़ा हांसी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में काफी आक्रामक नजर आए ।वहां वे कई ऐसी महत्वपूर्ण बातें कह गए जो पूरे राज्य मे चर्चा का विषय बनी हुई है। श्री जांगड़ा ने अपनी राय व्यक्त करते हुए जहां कांग्रेस के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी भूपेंद्र सिंह हुड्डा की कार्यशैली पर चोट की,वही भारतीय जनता पार्टी के नेताओं द्वारा की गई गलतियों की भी आलोचना की। उन्होंने यह भी कहा कि 2019 के विधानसभा चुनाव में गोहाना से उनकी टिकट काट दी गई जहां वह 50000 वोटों से जीत सकते थे।

भूपेंद्र सिंह हुड्डा की राजनीतिक कार्यशैली की आलोचना करते हुए रामचंद्र जांगड़ा ने एक तरह से उन्हें जाति आधारित राजनीति का एक तरफा पक्षधर बताने की कोशिश की वही भविष्य में इसका खामियाजा भुगतने की भी चेतावनी दे डाली। उन्होंने अपनी बात इस तरह से की कि जो नेता एक कौम की बात करता है उसे राजनीति में ऐच्छिक सफलता नहीं मिल सकती। उन्होंने कहा कि श्री हुड्डा पिता-पुत्र जिस तरह से 2019 के लोकसभा के चुनाव में रोहतक और सोनीपत लोकसभा क्षेत्रों में चुनाव में चुनाव हार चुके हैं वैसे ही भविष्य में भी इस क्षेत्र में उन्हें सफलता मिलने वाली नहीं है और उन्हें एक बार फिर हार का स्वाद चखना पड़ेगा। श्री जांगड़ा द्वारा यह दावा उस समय किया गया है जब भूपेंद्र सिंह हुड्डा के समर्थक हरियाणा में कांग्रेस की एकतरफी जीत के दावे कर रहे हैं।
इस मामले में उन्होंने चौधरी देवी लाल का उदाहरण देते हुए कहा कि वह बहुत बड़े नेता थे। हरियाणा में उनके नेतृत्व में 90 में से 85 एमएलए बन कर आए थे परंतु उन्होंने बाद में जाति पति के नाम पर अजगर के कांसेप्ट पर आहीर, जाट, गुज्जर और राजपूत जाति के नाम पर पार्टी बनाने और शेष जातियों की अनदेखी करने जैसा एक बयान दिया तो उन्हें भारी राजनीतिक नुकसान हुआ और वह उसके बाद हरियाणा से कोई चुनाव नहीं जीत पाए ।यद्यपि उनकी यह बात पूरी तरह से सच नहीं है क्योंकि उन्होंने यह कहा कि चौधरी देवीलाल ने हरियाणा में कोई चुनाव नहीं जीता वह हरियाणा से बाहर राजस्थान के सीकर से सांसद बने थे । याद रहे कि चौधरी देवीलाल ने 1989 में रोहतक से भी चुनाव जीता था। वह दोनों जगह से सांसद बने थे परंतु उन्होंने रोहतक से त्यागपत्र दे दिया था।
रामचंद्र जांगड़ा ने 2019 के चुनाव का उदाहरण देते हुए शायद यह बताने की कोशिश की है कि सोनीपत का यह चुनाव भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने यह सोचकर लड़ा था कि वह लगभग 2 लाख वोटों से जीतेंगे परंतु लगभग पौने दो लाख वोटों से हार गए। श्री जांगड़ा का यह सब कहने का आशय यह लगता है कि भूपेंद्र सिंह हुड्डा की कार्यशैली जैसी उस समय थी वैसी ही अब भी है।
श्री जांगड़ा ने अपने अनुभवों और अनुमानों के आधार पर यह जो दावा किया है उसकी पड़ताल चुनाव के बाद ही होगी लेकिन इतना जरूर है कि हरियाणा की राजनीति में जातीय फैक्टर आज भी पहले की तरह कायम है ।
श्री जांगड़ा का यह बयान उनके क्रेडिट से जुड़ गया है। जैसा उन्होंने कहा है ऐसे ही चुनाव परिणाम आए तो फिर श्री जांगड़ा का राजनीतिक कद राजनीतिक महत्व और बढ़ जाएगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो फिर उन्हें इसका नुकसान भी होगा।
यद्यपि रोहतक और सोनीपत में भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उनके पुत्र दोनों कांग्रेस के प्रत्याशी थे और चुनाव हार गए। परंतु इन 2 लोकसभा क्षेत्रों में विधानसभा के चुनाव में संबंधित 18 विधानसभा क्षेत्रों में से 11 पर कांग्रेस के विधायक बने थे।
इस बात का जवाब श्री जांगड़ा के उस बयान से जुड़ा हुआ है जो उन्होंने अपनी ही पार्टी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को और उनकी गलतियों को लेकर दिया। उन्होंने कहा कि 2019 में 75 पार के नारे के बावजूद भारतीय जनता पार्टी 40 सीटों तक इसलिए सिमट कर रह गई कि पार्टी ने टिकट बांटने के समय गफलत का परिचय दिया। मतलब टिकट गलत बाटी। यदि टिकट ठीक बंट जाती तो परिणाम और ही होते। उन्होंने कहा कि गोहाना से खुद उनकी टिकट काट दी गई ।यदि वह उम्मीदवार होते तो 50,000 मतों से जीतते। उनका कहने का मतलब है कि विधानसभा में रोहतक सोनीपत में कांग्रेस के 11 विधायक जीत कर आने के पीछे का कारण भाजपा का गलत टिकते बांटना भी था। सोनीपत जिले में भी गलत टिकटें बांटी गई। यहां यह बताना जरूरी है कि श्री जांगड़ा 2014 में गोहाना से ही भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं और वे मुकाबले में रहकर यह चुनाव हार गए थे। श्री जांगड़ा को लगता है कि हार के बाद वे सरकार में चेयरमैन रहे और पूरे 5 साल हल्के में काम किया। हल्के को समझा और उन्हें यह भरोसा हो गया था कि 2019 में उन्हें इसका भरपूर लाभ मिलेगा। परंतु पार्टी ने उनकी उपेक्षा कर जाट प्रत्याशी के रूप में एक और नए उम्मीदवार तीरथ राणा को टिकट दे दी और वह भी चुनाव हार गए। जहां तक 2014 का सवाल है , उन्हें दो चीजों का नुकसान हुआ । गोहाना इनके लिए नया विधानसभा क्षेत्र था और उन्हें भाजपा के घोषित जाट प्रत्याशी जय सिंह ठेकेदार की टिकट वापिस लेकर टिकट दी गई थी। जाट मतदाताओं में इसकी भी नाराजगी भी थी जो स्वाभाविक है। 2019 में गोहाना में विभिन्न दलों से जो उम्मीदवार चुनाव मैदान में आए और जो परिणाम सामने आए उसे देखते हुए यह जरूर कहा जा सकता है कि रामचंद्र जांगड़ा भाजपा के उम्मीदवार होते तो वह चुनाव जीत सकते थे ।जहां तक 50000 मतों के अंतर का सवाल है यह अनुमान श्री जांगड़ा का है हमारा नहीं।
ऐसा जरूर लगता है कि श्री जांगड़ा की रूचि अब भी गोहाना विधानसभा क्षेत्र में है और भविष्य में भी वे गोहाना से चुनाव लड़ने की कोशिश में रहेंगे।वह गोहाना की राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं। यही उनका कार्यालय भी है ।सांसद के रूप में अनुदान देने के मामले में भी गोहाना को पूरी प्राथमिकता देते हैं। वह भारतीय जनता पार्टी के हरियाणा के प्रथम पंक्ति के पिछड़े वर्ग के नेता तो है ही, अब सांसद बनने के बाद पार्टी में उनकी अहमियत पहले से भी ज्यादा हो गई है ।उनका राजनीतिक अनुभव भी उनके काम आएगा। अब देखना यह है कि अगले चुनाव में भारतीय जनता पार्टी टिकटों के बंटवारे को लेकर अपनी गलती सुधारेगी या नहीं। इतना जरूर है कि उन्होंने एक जाति विशेष के नाम पर राजनीति करने का खामियाजा भुगतने की जो बात कही है,उसका क्या औचित्य है इसकी टेस्टिंग 2024 के चुनाव में एक बार फिर हो जाएगी।

राज्यसभा सांसद भाजपा नेता रामचंद्र जांगड़ा

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